कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली २१४ कलिकालकी कुचाल काहू तौ न हरकी ॥ बीसीं विस्वनाथकी बिसाद् बड़ो बारानसीं, बूझिये न ऐसी गति संकर-सहरकी। कैसे कहै तुलसी वृषासुरके वरदानि बानि जानि सुधा तजि पीवनि जहरकी ॥१७०॥ जहाँके महादेवजी-जैसे स्वामी और पार्वतीजी-जैसी स्वामिनी हैं तथा लोक और वेदमें भी जिस स्थानकी महिमा प्रसिद्ध है, जहाँ रुद्रके गण ही योद्धा हैं और श्रीषडानन एवं गणेशजी सेनापति हैं, वहाँ भी कलिकी कुचालको किसीने नहीं रोका। इस विश्वनाथ- की बीसीमें उस वाराणसीमें बड़ा भारी विषाद छाया हुआ है; शङ्करके नगरकी ऐसी दुर्दशा है कि पूछो मत। वे भस्मासुरको वर देनेवाले ठहरे, उनका अमृत छोड़कर विष पीनेका स्वभाव जानकर भी तुलसीदास उनके विषयमें किस प्रकार कोई बात कह सकता है ? [अर्थात् उनका तो स्वभाव ही उलटा है, इसलिये नगरकी चिन्ता न कर यदि वे कलियुगको पाले हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं।] लोक-वेदहूँ विदित बारानसीकी बड़ाई बासी नरनारि ईस-अंबिका-सरूप हैं। कालनाथ कोतवाल, दंडकारि दंडपानि, सभासद गनप-से अमित अनूप हैं॥ तहाँऊँ कुचालि कलिकालकी कुरीति, कैधौं जानत न मूढ़ इहाँ भूतनाथ भूप हैं।