कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ उत्तरकाण्ड सुधरेगी—मेरे माता-पिता और गुरु तो श्रीशङ्कर और पार्वतीजी ही हैं। काशीमें महामारी गौरीनाथ, भोरानाथ, भगत भवानीनाथ ! विस्वनाथपुर फिरी आन कलिकालकी । संकर-से नर, गिरिजा-सी नारीं कासीबासी, बेद कही, सही ससिसेखर कृपालुकी ॥ छमुख-गनेस तें महेसके पियारे लोग बिकल बिलोकियत, नगरी बिहाल की । पुरी-सुरबेलि केलि काटत किरात कलि निठुर निहारिये उघारि डीठि भालकी ॥१६९॥ हे पार्वतीपने ! हे भोलानाथ ! हे भवानीपने ! इस विश्वनाथ- पुरी-काशीमें आज कलिकालकी दुहाई फिरी हुई है। काशीमें रहनेवाले पुरुष शङ्करके समान हैं और स्त्रियाँ पार्वतीजीके सदृश हैं—ऐसा वेदने कहा है और इसपर कृपालु चन्द्रशेखरकी भी सही है; किन्तु हे महेश ! आज [कलिके प्रतापसे] वे लोग जो शङ्करको षडानन और गणेशसे भी प्यारे हैं, बड़े व्याकुल दीख पड़ते हैं, सारी काशीपुरीको (इस कलिने) बेहाल कर दिया है। यह कलिरूप निष्ठुर किरात आपकी पुरीरूप कल्पलताको खेलहीमें काट रहा है। इसे अपने मस्तकका नेत्र खोलकर देखिये। ठाकुर महेस, ठकुराइनि उमा-सी जहाँ, लोक-वेदहूँ विदित महिमा ठहरकी । भट रुद्रगन, पूत गणपति-सेनापति