भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 228 में से

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पृष्ठ 195

कवितावली १९८ सुपमाको ढेरु कैधौं, सुकृत-सुमेरु कैधौं, संपदा सकल मुद-मंगलको घरु है॥ देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये प्रतीति मानि तुलसी, विचारि काको थरु है। सुरसरि निकट सुहावनी अवनि सोहै रामरवनीको बडु कलि कामतरु है ॥१३९॥ उसके पत्ते मरकतमणिके समान नीलवर्ण तथा फल माणिक्यके सदृश (हरे रंगके) हैं। अपनी जटाओंके कारण वह ऐसा शोभा देता है, मानो वृक्षरूपमें महादेवजी ही हों। वह मानो सुन्दरताका पुञ्ज है, अथवा सुकृतका सुमेरु है किंवा सब प्रकार- की सम्पत्ति, आनन्द और मंगलका घर है। यदि 'यह किसका स्थान है' [अर्थात् जानकीजीका निवासस्थल है] इसका विचार करके विश्वास और प्रीतिपूर्वक उसका सेवन किया जाय तो वह सब प्रकारके इच्छित फल देता है। वह सुन्दर भूमि श्रीगङ्गाजीके तटपर सुशोभित है; यह रामवल्लभा श्रीजानकीजीका वट कलियुगमें कल्पवृक्षके समान है। देवधुनि पास, मुनिबासु, श्रीनिवासु जहाँ, प्राकृतहूँ वट-बूट बसत पुरारि हैं। जोग-जप-जागको, बिरागको पुनीत पीठु रागिन पै सीठ उठि बाहरी निहारिहैं ॥ 'आयसु', 'आदेस', 'बाबू' भलो-भलो भावसिद्ध तुलसी विचारि जोगी कहत पुकारि हैं।

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