कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरकाण्ड १९१ उत्पन्न हुआ है।' इससे मेरा स्वार्थ और परमार्थ दोनों सिद्ध हो जायँगे; फिर मेरे अंदर किसी प्रकार की कमी नहीं रह जायगी। सीतावट-वर्णन जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु 'मरा मरा' जपें सिख सुनि रिषि सातकी। सीयको निवास, लव-कुसको जनमथल तुलसी छुअत छाँह ताप गरै गातकी ॥ बिटपमहीप सुरसरित समीप सोहै, सीतावदु पेखत पुनीत होत पातकी। बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि, अंकित जो जानकी-चरन-जलजातकी ॥१३८॥ जहाँ सप्तर्षियोंका उपदेश सुनकर (राममन्त्रको उलटे क्रमसे) 'मरा-मरा' जपते हुए वाल्मीकिजी व्याधसे महामुनि साधु हो गये, जो श्रीसीताजीका निवासस्थान और कुश तथा लवका जन्मस्थान था, तुलसीदासजी कहते हैं जहाँकी छायाका स्पर्श होते ही शरीरका सारा ताप शान्त हो जाता है, वह वृक्ष-राज सीतावट श्रीगङ्गाजीके तटपर शोभायमान है । उसके दर्शन- मात्रसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है। यह स्थान बारिपुर और दिगपुर इन दो गाँवोंके बीचमें है* और श्रीजानकीजीके चरणकमलोंसे अङ्कित है। मरकतबरन परन, फल मानिक-से लसै जटाजूट जनु रूखवेष हरु है।
- यह स्थान प्रयाग और काशीके बीचमें सीतामढ़ी नामसे प्रसिद्ध है।