भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 196

१९३ उत्तरकाण्ड रामभगतनको तौ कामतरुतें अधिक, सियबटु सेयें करतल फल चारि हैं ॥१४०॥ साधारण वटवृक्षमें भी श्रीमहादेवजीका निवास होता है, फिर इसके समीप तो गङ्गाजीका तट तथा मुनिवर वाल्मीकिजी- का आश्रम है, जहाँ श्रीसीताजीने निवास किया था [ अतः इसकी महिमाका तो वर्णन ही कौन कर सकता है ? ] यह योग, जप, यज्ञ और वैराग्यके लिये तो बड़ा पवित्र पीठ है; किन्तु रागी पुरुषोंको, जो इसे बाहरी दृष्टिसे देखेंगे, यह बड़ा रूखा जान पड़ता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि यहाँके लोग विचारपूर्वक 'जो आज्ञा', 'आदेश', 'भैया' आदि शिष्ट शब्दोंका स्वभावसे ही प्रयोग करते हैं । यह सीतावट रामभक्तोंके लिये तो कल्पवृक्षसे भी अधिक है, क्योंकि इसका सेवन करनेसे [ अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ] चारों फल करतलगत हो जाते हैं [ जब कि कल्पवृक्षसे अर्थ, धर्म और काम केवल तीन ही फल मिलते हैं ] । चित्रकूट-वर्णन जहाँ बनु पावनो, सुहावने बिहंग-मृग, देखि अति लागत अनंदु खेत-खूँट-सो । सीता-राम-लखन-निवासु, बासु मुनिनको, सिद्ध-साधु-साधक सबै बिबेक-बूट-सो ॥ झरना झरत झारि सीतल पुनीत बारि, मंदाकिनि मंजुल महेसजटाजूट सो । तुलसी जौं रामसों सनेहु साँचो चाहिये तौ सेइये सनेहसों बिचित्र चित्रकूट सो ॥१४१॥ क० १३—