भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 197

कवितावली १९४ जहाँका वन अति पवित्र है, और पशु-पक्षी अत्यन्त सुहावने हैं तथा जिसे खेतके टुकड़ेके समान (हरा-भरा) देखकर बड़ा आनन्द होता है; जहाँ सीता, राम और लक्ष्मणका निवास था. जहाँ अनेकों मुनिजन रहते हैं तथा जो सिद्ध, साधु और साधकों- के लिये विवेकरूपी वृक्षके समान है; जहाँ सबा झरनोंसे अति शीतल और पवित्र जल झरता रहता है तथा मन्दाकिनी नदी श्रीमहादेवजीके जटाजूटके समान जान पड़ती है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें भगवान् रामके सच्चे स्नेहकी चाह है तो प्रेमपूर्वक अद्भुत चित्रकूटका सेवन करो । मोह-वन कलिमल-पल-पीन जानि जियँ साधु-गाइ-विप्रनके भयको नेवारिहै। दीन्ही है रजाइ राम, पाइ सो सहाइ लाल लखन समत्थ बीर हेरि हेरि मारिहै॥ मंदाकिनी मंजुल कमान असि, बान जहाँ धारि-धार धीर धरि सुकर सुधारिहै। चित्रकूट अचल अहेरि बैठ्यो घात मानो पातकके ब्रात घोर सावज सँघारिहै ॥१४२॥ मोहरूपी वनमें पापराशिरूप सावज (हिंस्र पशु) कलि- कल्मषरूप मांससे मोटे हो रहे हैं, ऐसा चित्तमें जानकर श्रीरघु- नाथजीने आज्ञा दी है; अतः समर्थ वीर लखनलालकी सहायता पा चित्रकूट अचल अहेरी होकर उनकी घातमें बैठे हुए हैं। वे उन्हें ढूँढ-ढूँढ़कर मारेंगे तथा इस प्रकार साधु, गौ और ब्राह्मणोंके भयको हटायेंगे । उसके लिये वे मन्दाकिनी-जैसी मनोहर कमान