कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १९६ दर्शन करने चलो । उनके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े अपराध नष्ट हो जाते हैं; वहा अच्छे-अच्छे साधु स्नान किया करते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं—वहाँ श्रीगङ्गा और यमुनाके शुक्ल एवं श्यामवर्ण जलका संगम बड़ा ही शोभायमान जान पड़ता है; उसकी तरङ्गोंको देखकर हृदय बड़ा हर्षित होता है; मानो इधर- उधर फैले हुए कामधेनुके शुक्लवर्ण मनोहर बछड़े हरी-हरी घास चर रहे हों । श्रीगङ्गा-माहात्म्य देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा, कुल कोटि उधारे । देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ बिमान सँवारे ॥ पूजाको साजु विरंचि रचैं तुलसी, जे महातम जाननिहारे । ओककी नींव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे ॥१४५॥ जिस मनुष्यने गङ्गास्नानके लिये मनमें जानेका विचारमात्र कर लिया उसके करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार हो गया । उसे चलता देखकर [ उसे वरण करनेके लिये ] देवाङ्गनाएँ आपसमें झगड़ने लगती हैं, देवराज इन्द्र उसके लिये विमान बनाकर सजाने लगते हैं; ब्रह्माजी, जो कि उसके माहात्म्यको जाननेवाले हैं, उसके पूजनकी सामग्री जुटाने लगते हैं और हे गङ्गाजी ! तुम्हारी तरङ्गोंका दर्शन होते ही विष्णुलोकमें ( उसके लिये ) घरकी नींव पड़ जाती है [ अर्थात् उसका विष्णुलोकमें जाना निश्चित हो जाता है ] । ब्रह्म जो ब्यापकु बेद कहैं, गम नाहिं गिरा गुन-ग्यान गुनीको । जो करता, भरता, हरता, सुर-साहेबु, साहेबु दीन-दुनीको ॥