भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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१९७ उत्तरकाण्ड सोइ भयो द्रवरूप सही, जो है नाथु विरंचि महेस मुनी को । मानि प्रतीति सदा तुलसी जलु काहे न सेवत देवधुनीको ॥१४६॥ जिस परब्रह्म परमात्माको वेद सर्वव्यापी कहते हैं, जिसके गुण और ज्ञानकी थाह गुणीजन और शारदा भी नहीं पा सकते; जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला, देवताओंका स्वामी तथा लोक-परलोकका प्रभु है; जो ब्रह्मा, शिव और मुनि- जनोंका भी स्वामी है, निश्चय वही जलरूप हो गया है । तुलसी- दासजी कहते हैं—अरे, विश्वास करके सर्वदा श्रीगङ्गाजलका ही सेवन क्यों नहीं करता ? बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसै पद पापु लहौंगो । ईसु ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभुकी समताँ बड़े दोष दहौंगो ॥ बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीरको ह्वै तव तीर रहौंगो । भागीरथी ! बिनवौं कर जोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो १ ४७ हे गङ्गे ! तुम्हारे जलके दर्शनके प्रभावसे यदि मैं विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पाप लगेगा [ क्योंकि तुम्हारा जन्म विष्णुभगवान्के चरणोंसे है, और यदि मैं भी विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पापका भागी होना पड़ेगा ]; और यदि महादेव हो गया तो सिरपर धारण करनेसे मुझे डर है कि इस प्रकार अपने प्रभु भगवान् शङ्करकी समता करनेके बड़े भारी अपराधसे दुःख पाऊँगा । इसलिये, भले ही मुझे बारंबार शरीर धारण करना पड़े, मैं तो श्रीरघुनाथजीका दास होकर ही तुम्हारे तीरपर रहूँगा । हे भागीरथि ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ—मैं वही बात कहूँगा जिससे फिर दोष न लगे ।