कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १९८ अन्नपूर्णा-माहात्म्य लालची ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन, बदन मलीन, मन मिटै ना बिसूरना। ताकत सराध, कै विवाह, कै उछाह कछु, डोलै लोल, बूझत सबद ढोल-तूरना ॥ प्यासेहूँ न पावै वारि, भूखें न चनक चारि, चाहत अहारन पहार, दारि घूर ना। सोकको अगार, दुखभार भरो तौलौं जन जौलौं देवी द्रवै न भवानी अन्नपूरना ॥१४८॥ जबतक देवी अन्नपूर्णा कृपा नहीं करतीं तभीतक मनुष्य लालची होकर (टुकड़े-टुकड़ेके लिये) लालायित होता है और दीन और मलिनमुख हो द्वार-द्वारपर बिलबिलाता रहता है, परन्तु उसके मनकी चिन्ता दूर नहीं होती; कहीं श्राद्ध अथवा विवाह अथवा कोई उत्सव तो नहीं, इस बातकी टोहमें रहता है, चञ्चल होकर इधर-उधर घूमता है और यदि कहीं ढोल या तुरहीका शब्द होता है तो पूछता है [ कि यहाँ कोई उत्सव तो नहीं है ? ] । प्यास लगनेपर उसे जल नहीं मिलता, भूख होनेपर चार चने भी नहीं मिलते, पहाड़के समान भोजनकी इच्छा होती है, परन्तु घूरेपर पड़ी दाल भी नहीं मिलती। इस प्रकार वह शोकका आश्रयस्थान और दुःखके भारसे दबा रहता है। शङ्कर-स्तवन भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग हर। सीस गंग, गिरिजा अर्धंग, भूषन भुजंगबर ॥