भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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१८९ उत्तरकाण्ड मुंडमाल, बिधु बाल भाल, डमरू कपालु कर । बिबुधवृंद-नवकुमुद-चंद, सुखकंद सूलधर ॥ त्रिपुरारि त्रिलोचन, दिग्वसन, बिषभोजन, भवभयहरन । कह तुलसिदासु सेवत सुलभ सिव सिव सिव संकर सरन॥१४९॥ श्रीमहादेवजी शरीरमें भस्म रमाये रहते हैं, वे कामदेवका दलन करनेवाले और सर्वदा असंग हैं। उनके सिरपर श्रीगङ्गाजी हैं, अर्धाङ्गमें पार्वतीजी हैं तथा अच्छे-अच्छे सर्प ही उनके आभूषण हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला है, मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्रमा है तथा हाथोंमें डमरू और कपाल सुशोभित हैं। देवताओंके समाजरूपी नवीन कुमुद-कुसुमके लिये शूलधारी भगवान् शङ्कर साक्षात् चन्द्रमा हैं। वे सुखकी जड़, त्रिपुर दैत्यके शत्रु, तीन नेत्रोंवाले, दिगम्बर, विषभोजी एवं संसारका भय निवृत्त करनेवाले श्रीमहादेवजी भजन किये जानेपर बड़ी सुगमतासे प्राप्त हो जाते हैं; मैं उन श्रीशिवशङ्करकी शरण हूँ। गरल-असन दिगबसन ब्यसनभंजन जनरंजन । कुंद-इंदु-कर्पूर-गौर सच्चिदानंदघन ॥ बिकटबेष, उर सेष, सीस सुरसरित सहज सुचि । सिव अकाम अभिरामधाम नित रामनाम रुचि ॥ कंदर्पदपं दुगम दमन उमारमन गुनभवन हर । त्रिपुरारि ! त्रिलोचन ! त्रिगुनपर ! त्रिपुरमथन ! जय त्रिदसबर ॥ जो विष भक्षण करनेवाले, दिगम्बर, दुःखहारी, भक्तमन- रञ्जन, कुन्द, चन्द्र एवं कर्पूरके समान गौरवर्ण, सच्चिदानन्दघन और विकट वेषधारी हैं; जिनके हृदयपर शेषजी और मस्तकपर