कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १७८ वेष सुबनाइ सुचि वचन कहैं चुबाइ जाइ तौ न जरनि धरनि-धन-धामकी । कोटिक उपाय करि लालि पालिअत देह, मुख कहिअत गति रामहीके नामकी ॥ प्रगटैं उपासना, दुरावैं दुरवासनाहि, मानस निवासभूमि लोभ-मोह-कामकी । राग-रोष-ईरिषा-कपट-कुटिलाई भरे तुलसी-से भगत भगति चहैं रामकी ॥११९॥ जो लोग उत्तम (साधुका-सा) वेष बनाकर पवित्र एवं अमृत चूते हुए वचन बोलते हैं, किन्तु जिनके हृदयसे पृथ्वी, धन और घरकी आग (तृष्णा) दूर नहीं होती; जो करोड़ों उपाय करके शरीरका लालन-पालन करते हैं, किन्तु मुखसे कहते हैं कि हमें तो केवल रामनामका ही भरोसा है; जो अपनी उपासनाको तो प्रकट करते हैं; किन्तु अपनी बुरी वासनाओंको छिपाते हैं तथा जिनके चित्त लोभ, मोह और कामके निवास- स्थान बने हुए हैं, तुलसीदास कहते हैं—वे आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, कपट और कुटिलतासे भरे हुए मेरे-जैसे भक्त भी रामकी भक्ति चाहते हैं ! [अर्थात् जो पुरुष ऐसे कुटिल आचरण करते हुए भी भगवान्को रिझानेकी आशा रखते हैं, वे बड़े ही हास्यास्पद हैं ।] कालिहीं तरुन तन, कालिहीं धरनि-धन, कालिहीं जितौंगो रन, कहत कुचालि है । कालिहीं साधौंगो काज, कालिहीं राजा-समाज,