कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७७ उत्तरकाण्ड कौन हृदयँ नहि लाग कठिन अति नारि-नयन-सर ? लोचनजुत नहि अंध भयो श्री पाइ कौन नर ? सुर-नाग-लोक महिमंडलहुँ को जु मोह कीन्हो जय न ? कह तुलसिदासु सो ऊबरै, जेहि राख रामु राजिवनयन ॥११७॥ क्रोधने किसको नहीं जलाया ? कामने किसको वशीभूत नहीं किया ? लोभने किसको दृढ़ फाँसीमें बाँधकर त्रस्त नहीं किया ? किसके हृदयमें स्त्रियोंके नेत्ररूपी कठिन बाण नहीं लगे ? और कौन मनुष्य धन पाकर आँखोंके रहते हुए भी अंधा नहीं हुआ ? सुरलोक, पृथ्वीमण्डल ( नरलोक ) तथा नागलोक अर्थात् पाताललोकमें ऐसा कौन है जिसको मोहने न जीता हो । गोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं कि इनसे तो वही बच सकता है जिसकी रक्षा कमलनयन श्रीरामजी करते हैं । भौंह-कमान सँधान सुठान जे नारि-बिलोकनि-बानतें बँचे । कोप-कृसानु गुमानु-अवाँ घट ज्यों जिनके मन आव न आँचे ॥ लोभ सबै नटके बस ह्वै कपि-ज्यों जगमें बहु नाच न नाचे । नीके हैं साधु सबै तुलसी, पै तेई रघुवीरके सेवक साँचे ॥ जो लोग भ्रुकुटिरूप कमानपर अच्छी प्रकार चढ़ाये हुए कामिनीकटाक्षरूप बाणसे बचे हुए हैं, अभिमानरूप अवाँमें क्रोधरूप अग्निकी ज्वालासे जिनके मन घड़ेकी भाँति नहीं तपे हों तथा जो लोभरूप नटके अधीन होकर संसारमें बंदरकी तरह अनेक नाच नहीं नाचे-तुलसीदासजी कहते हैं-वे ही भगवान् श्रीरामके सच्चे दास हैं । यों तो सभी साधु अच्छे हैं । क० १२-