कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १७६ करें, उसकी मरकतमणिमय शाखा और पत्ते हों और मञ्जरी साक्षात् लक्ष्मीजी हों तथा सब प्रकारकी मुक्तियाँ ही जिसके फल हों, ऐसा वह कल्पतरु स्वभावसे ही सब प्रकारके मङ्गल और सुखोंकी वर्षा करता हो, तो भी, तुलसीदासजी कहते हैं—हे रघुवंशमणि ! वह कल्पवृक्ष क्या कभी आपके हाथोंके बराबर हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता। जाय सो सुभटु समर्थ पाइ रन रारि न मंडै । जाय सो जती कहाय विषय-वासना न छंडै ॥ जाय धनिकु बिनु दान, जाय निर्धन बिनु धर्महि । जाय सो पंडित पढ़ि पुरान जो रत न सुकर्महिं ॥ सुत जाय मातु-पितु-भक्ति बिनु, तिय सो जाय जेहि पति न हित। सब जाय दासु तुलसी कहै, जौं न रामपद नेहु नित॥११६॥ वह समर्थ वीर व्यर्थ है जो संग्राम ( का अवसर ) पाकर भी युद्ध नहीं करता । जो यति ( संन्यासी अथवा विरक्त ) कहला- कर विषयकी वासनाको न छोड़े वह विरक्त भी व्यर्थ है । दानशून्य धनी और धर्माचरणशून्य निर्धन भी व्यर्थ है । जो पण्डित पुराण पढ़कर सुकर्ममें रत नहीं है वह भी नष्ट है । जो पुत्र माता-पिताकी भक्तिरहित है वह भी नष्ट है और जिसे पति प्यारा नहीं है वह स्त्री भी व्यर्थ है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित्य नवीन प्रेम न हो तो सभी कुछ व्यर्थ है । को न क्रोध निरदह्यो, काम बस केहि नहि कीन्हो ? को न लोभ दृढ़ फंद बाँधि त्रासन करि दीन्हो ?