कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७५ उत्तरकाण्ड जय सिय-वियोग-दुख हेतु कृत-सेतुबंध-वारिधिदमन ! दसर्मीस विभीषन अभयप्रद, जय जय जय जानकिरमन! ॥११४॥ मायामृगरूप मारीचको मारनेवाले तथा जटायु और शबरीका उद्धार करनेवाले भगवान् राम ! आपकी जय हो । कबन्धको मारनेवाले और बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंको विदीर्ण करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय हो ! बलसम्पन्न बालिका नाश करनेवाले, सुग्रीवको राज्य देनेवाले तथा संतोंका हित करनेवाले ! आपकी जय हो । भयानक भालु और वानर वर्गोंके कटकका पालन करनेवाले दयार्द्रचित्त रघुनाथजी ! आपकी जय हो । जानकीजीके वियोगजनित दुःखके कारण समुद्रका दमन करके उसपर सेतु बाँधनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । तथा रावणसे विभीषणको अभय देनेवाले हे जानकीरमण ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !! रामप्रेमकी प्रधानता कनकभूधरु केदारु, बीजु सुंदर सुरमनि बर । सींचि कामधुक धेनु सुधामय पय विसुद्धतर ॥ तीरथपति अंकुरसरूप जच्छेस रच्छ तेहि । मरकतमय साखा-सुपत्र, मंजरिय लच्छि जेहि ॥ कैवल्य सकल फल, कलपतरु सुभ सुभाव सब सुख वरिस । कह तुलसिदास, रघुबंसमनि ! तौ कि होइ तुअ कर सरिस॥११५॥ सुमेरु पर्वत थाल्हा हो, सुन्दर चिन्तामणि बीज हो, कामधेनुके अमृतमय अत्यन्त शुद्ध दुग्धसे उसे सींचा जाय, उससे तीर्थराज प्रयाग अंकुररूपसे प्रकट हो, उसकी रक्षा स्वयं कुबेरजी