कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १८० निज अघजाल, कलिकालकी करालता बिलोकि होत व्याकुल, करत सोई सोचु हौं ॥१२१॥ भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों कालोंमें त्रिलोकीमें तुलसीदासके समान नीच कोई नहीं हुआ। सभी साधुजन इसकी निन्दा करते हैं, परन्तु मैं सुनकर भी संकोच नहीं मानता। जानकीनाथ भगवान् राम भी इसे योग्य नहीं समझते, इसीसे मुझे अपनानेमें उन्हें अपने चित्तमें हानि जान पड़ती है। मुझे इस बात- की शिकायत भी क्यों होनी चाहिये; क्योंकि वास्तवमें ही मैं बड़ा पापी, पाखण्डी और नीच हूँ। मैं पेट भरनेके लिये ही महाराजका कहलाया और महाराजने भी कहा है कि मैं अपने शरणागतका उद्धार कर देता हूँ। किन्तु अपनी पापराशि और कलिकालकी कुटिलता देखकर मैं व्याकुल हो जाता हूँ और उसी (अपने उद्धारके ही) विषयमें चिन्ता करने लगता हूँ। धर्मकें सेतु जगमंगलके हेतु भूमि- भारु हरिवेको अवतारु लिये नरको। नीति औ प्रतीति-प्रीतिपाल चालि प्रभु, मानु लोक-वेद राखिवेको पनु रघुबरको ॥ बानर-बिभीषनकी ओर के कनावड़े हैं, सो प्रसंगु सुनैं अंगु जरै अनुचरको। राखे रीति आपनी जो होइ सोई कीजै, बलि, तुलसी तिहारो घर जायऊ है घरको ॥१२२॥