भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 184

१८१ उत्तरकाण्ड धर्मके सेतु भगवान् संसारका कल्याण करनेके लिये और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यके रूपमें अवतीर्ण हुए; नीति, प्रतीति और प्रीतिका पालन करना प्रभुका स्वभाव ही है तथा लोक और वेदकी मर्यादा रखना यह भी श्रीरघुवीरका प्रण है । आप सुग्रीव और विभीषणके ऋणी हैं, यह बात सुनकर दासका अङ्ग-अङ्ग जलता है [कि मुझपर ऐसी कृपा क्यों नहीं करते ?] । अतः मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, अपने प्रणकी रक्षा करके आपसे जो बने वही कीजिये । यह तुलसीदास तो आपके घरका घर-जाया (पुस्तैनी) सेवक है। नाम महाराजके निबाह नीको कीजै उर सबही सोहात, मैं न लोगनि सोहात हौं । कीजै राम ! बार यहि मेरी ओर चष-कोर, ताहि लागि रंक ज्यों सनेहको ललात हौं ॥ तुलसी बिलोकि कलिकालकी करालता कृपालको सुभाउ समुझत सकुचात हौं । लोक एक भाँतिको, त्रिलोकनाथ लोकवस आपनो न सोचु, स्वामी-सोचहीं सुखात हौं ॥१२३॥ महाराजके नामके साथ अच्छी प्रकार निर्वाह करनेवाला (अर्थात् राम-नाम जपनेवाला) मनसे सबको अच्छा लगता है, परन्तु मैं लोगोंको अच्छा नहीं लगता । अतः हे राम ! इस बार आप मेरी ओर कृपादृष्टि कीजिये, आपके कृपाकटाक्षके लिये मैं लालयित हूँ। जिस प्रकार दरिद्र स्नेहके लिये अथवा स्नेहयुक्त पदार्थों (पकवानों) के लिये लालयित रहता है । तुलसीदासजी कहते हैं—मैं कलिकालकी करालता और कृपालु प्रभुके स्वभावको