कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड श्रीजानकीजीको जगत्की माता और कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रको जगत्के पिता जानकर मनमें ऐसे विचारकर देखो जिससे मुँहमें कालिमा न लगे । अनेकों विवाह देखे हैं, वेद-पुराण भी सुने और श्रेष्ठ साधु पुरुषोंसे तथा जो अन्य स्त्री-पुरुष परीक्षा कर सकते हैं, उनसे भी पूछा है; परन्तु ऐसे समान समधी और समाजकी जोड़ी कहीं नहीं है, और न श्रीरामचन्द्रजीके समान दुलहा तथा श्रीजानकीजी-जैसी दुलहिन ही हैं। बानी बिधि गौरी हर सेसहूँ गनेस कही, सही भरी लोमस भुसुंडि बहुबारिषो । चारिदस भुअन निहारि नर-नारि सब नारदसों परदा न नारदु सो पारिखो ॥ तिन्ह कही जगमें जगमगनि जोरी एक दूजो को कहैया औ सुनैया चप चारिखो । रमा रमारमन सुजान हनुमान कही सीय-सी न तीय न पुरुष राम-सारिखो ॥१६॥ सरस्वती, ब्रह्मा, पार्वती, शिव, शेष और गणेशने कहा है और चिरञ्जीवी लोमश तथा काकभुशुण्डिजीने साक्षी दी है; जिन नारदजीसे कहीं पर्दा नहीं है और जिनके समान दूसरा कोई स्त्री- पुरुषोंके लक्षणोंका जानकार नहीं है, उन्होंने भी चौदहों भुवनोंके समस्त स्त्री-पुरुषोंको देखकर यही कहा है कि संसारमें एक श्रीराम- जानकीजीकी [ ही ] जोड़ी जगमगा रही है। उनसे बढ़कर और कौन चार आँखोंवाला बतलाने और सुननेवाला है । स्वयं लक्ष्मी