कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १६ और श्रीमन्नारायण तथा तत्त्वज्ञ हनुमान्जीने कहा है कि जानकीजीके समान स्त्री और श्रीरामजीके समान पुरुष नहीं है । दूलह श्रीरघुनाथु बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माहीं । गावति गीत सबै मिलि सुंदरि वेद जुवा जुरि विप्र पढ़ाहीं ॥ रामको रूपु निहारति जानकी कंकनके नगकी परछाहीं । यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारत नाहीं ॥१७॥ सुन्दर राजमहलमें श्रीरामचन्द्रजी दुलहा और श्रीजानकीजी दुलहिन बनी हुई हैं । समस्त सुन्दरी स्त्रियाँ मिलकर गीत गा रही हैं और युवक ब्राह्मणलोग जुटकर वेदपाठ कर रहे हैं । उस अवसरमें श्रीजानकीजी हाथके कंकणके नगमें पड़ी हुई श्रीरामचन्द्रजी- की परछाहीं निहार रही हैं, इससे वे सारी सुधि भूल गयी हैं अर्थात् रूपकी शोभामें मन लीन हो गया है । उनके हाथ जहाँ-के-तहाँ रुक गये हैं और वे पलकें भी नहीं हिलाती हैं । परशुराम-लक्ष्मण-संवाद भूपमंडली प्रचंड चंडीस-कोदंडु खंड्यौ, चंड बाहुदंडु जाको ताहीसों कहतु हौं । कठिन कुठार-धार धरिबेको धीर ताहि, बीरता बिदित ताको देखिए चहतु हौं ॥ तुलसी समाजु राज तजि सो बिराजै आजु, गाज्यौ मृगराजु गजराजु ज्यौं गहतु हौं । छोनीमें न छाड्यौ छप्यौ छौनिपको छोना छोटो, छौनिप-छपन बाँको बिरुद बहुतु हौं ॥१८॥