कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७ बालकाण्ड [ परशुरामजीने गरजकर कहा-- ] राजाओंकी मण्डलीमें जिसने शिवजीका प्रचण्ड धनुष तोड़ा है और जिसके भुजदण्ड बड़े प्रचण्ड हैं, मैं उसीसे कहता हूँ--मैं अपने कठिन कुठारकी धारको धारण करनेकी उसकी धीरता और प्रसिद्ध वीरता देखना चाहता हूँ । वह राजसमाजको छोड़कर आज अलग विराजमान हो जाय अर्थात् राज-समाजसे बाहर निकल आवे । जैसे हाथीको सिंह पकड़ता है वैसे ही मैं उसे पकड़ूँगा । मैंने पृथ्वीपर राजाओंके छिपे हुए छोटे बालकको भी नहीं छोड़ा; मैं राजाओंको मारनेकी उत्कृष्ट कीर्ति धारण किये हुए हूँ । निपट निदरि बोले बचन कुठारपानि, मानी त्रास औनिपनि मानो मौनता गही । रोष माखे लखनु अकनि अनखोही बातें, तुलसी विनीत बानी विहसि ऐसी कही ॥ सुजस तिहारें भरे भुअन भृगुतिलक, प्रगट प्रतापु आपु कह्यो सो सबै सही । टूट्यौ सो न जुरैगो सरासनु महेसजूको, रावरी पिनाकमें सरीकता कहाँ रही ॥१९॥ जब परशुरामजीने अत्यन्त निरादरपूर्ण वचन कहे तब सब राजा लोग भयभीत हो ऐसे चुप हो गये, मानो मौन ग्रहण कर लिया हो । किन्तु ऐसे अनखावने वचन सुनकर लक्ष्मणजी रोषमें भर गये और हँसकर इस प्रकार नम्र वचन बोले--'हे भृगुकुलतिलक ! तुम्हारे सुयशसे [ चौदहों ] भुवन भरे हुए हैं । आपने जो अपना प्रसिद्ध प्रताप बखान किया है सो सब सही है; क० २--