भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली १८ परन्तु शिवजीका जो धनुष टूट गया वह तो अब जुड़ नहीं सकेगा । इस धनुषमें तो आपका कोई हिस्सा भी नहीं था [ जो आप इतना क्रोध करते हैं ] । गर्भके अर्भक काटनकौं पटु धार कुठारु कराल है जाको । सोई हौं बूझत राजसभा 'धनु को दल्यौ' हौं दलिहौं बलु ताको ॥ लघु आनन उत्तर देत बड़े लरिहैं मरिहै करिहै कछु साको । गोरो गरूर गुमान भर्यौ कहौ कौसिक छोटो-सो ढोटो है काको ॥ [ तब परशुरामजी बोले--] जिसके भयङ्कर कुठारकी धार गर्भके बालकोंको भी काटनेमें कुशल है वही मैं इस राजसभामें पूछता हूँ कि किसने इस धनुषको तोड़ा है ? उसके बलको मैं नष्ट करूँगा । छोटे मुँहसे बड़े-बड़े उत्तर देता है ! क्या लड़-मरकर कुछ नाम करेगा ? हे कौशिक ! यह गोरा और घमण्ड-गुमानसे भरा हुआ छोटा-सा लड़का किसका है ? मखु राखिबेके काज राजा मेरे संग दए, दले जातुधान जे जितैया बिबुधेसके । गौतमकी तीय तारी, मेटे अघ भूरि भार, लोचन-अतिथि भए जनक जनेसके ॥ चंड बाहुदंड-बल चंडीस-कोदंडु खंड्यौ, ब्याही जानकी, जीते नरेस देस-देसके । साँवरे-गोरे सरीर धीर महाबीर दोऊ, नाम रामु लखनु कुमार कोसलेसके ॥२१॥