कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९ बालकाण्ड [ तब विश्वामित्रजीने कहा-] मेरे यज्ञकी रक्षाके लिये महाराज दशरथने इन्हें मेरे सङ्ग कर दिया था और इन्होंने ऐसे-ऐसे राक्षसोंका नाश किया है जो इन्द्रको भी जीतनेवाले थे । गौतमकी स्त्री अहल्याके बड़े भारी पापको नष्ट कर उसे तार दिया है । अब नरनाथ जनकके नेत्रोंके अतिथि हुए हैं । इन्होंने अपने प्रचण्ड भुजदण्डके बलसे शिवजीके धनुषको तोड़ डाला है और देश-देशके राजाओंको जीतकर जानकीजीको विवाह लिया है । इन साँवले और गोरे शरीरवाले बड़े वीर और धीर दोनों बालकोंका नाम राम और लक्ष्मण है । ये कोशलदेशपति महाराज दशरथके राजकुमार हैं । काल कराल नृपालनके धनुभंगु सुनै फरसा लिएँ धाए । लखनहु रामु बिलोकि सप्रेम महारिसतें फिरि आँखि दिखाए ॥ धीरसिरोमनि वीर बड़े बिनयी बिजयी रघुनाथु सुहाए । लायक हे भृगुनायकु, से धनु-सायक सौंपि सुभायँ सिधाए ॥ धनुष-भङ्ग सुनकर राजाओंके कराल कालरूप श्रीपरशुरामजी अपना कुठार लेकर दौड़े । मोहिनी मूर्ति श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीको पहले प्रेमपूर्वक देखा, फिर महाक्रोधमें आ आँखें दिखाने लगे । श्रीरामचन्द्रजी स्वभावसे ही धीरशिरोमणि, महावीर, परमविनयी और विजयशील हैं । यद्यपि भृगुनायक परशुरामजी बड़े सुयोग्य वीर थे, तो भी उन्हें अपने धनुषबाण सौंपकर चले गये । इति बालकाण्ड