भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली २४ [ केवट कहता है—] इस घाटसे थोड़ी ही दूरपर केवल कमरभर जल है । चलिये, मैं थाह दिखला दूँगा । [ मैं नावपर तो आपको ले नहीं जाऊँगा, क्योंकि यदि अहल्याके समान ] आपकी चरण-रजका स्पर्शकर मेरी नावका भी उद्धार हो गया तो मैं घरकी स्त्रीको कैसे समझाऊँगा ? मुझको [ जीविकाके लिये ] और कुछ अवलम्ब नहीं है । अतः फिर अपने बाल-बच्चोंका पालन मैं किस प्रकार करूँगा ? हे नाथ ! बिना आपके चरण धोये मैं नावपर नहीं चढ़ाऊँगा, चाहे आप मुझे मार डालिये । रावरे दोषु न पायनको, पगधूरिको भूरि प्रभाउ महा है । पाहन तें बन-बाहनु काठको कोमल है, जलु खाइ रहा है ॥ पावन पाय पखारि कै नाव चढ़ाइहौं, आयसु होत कहा है । तुलसी सुनि केवटके बर वैन हँसे प्रभु जानकी ओर हहा है ॥ इसमें आपके चरणोंका कोई दोष नहीं है । आपके चरणकी धूलिका प्रभाव ही बहुत बड़ा है [ जिसके स्पर्शसे अहल्या पत्थरसे सुन्दरी स्त्री हो गयी, उससे इस नौकाका उद्धार हो जाना कौन बड़ी बात है ? [क्योंकि] पत्थरकी अपेक्षा तो यह काठका जलयान कोमल है और तिसपर यह पानी खाये हुए है अर्थात् पानीमें रहनेसे और भी अधिक कोमल हो गया है । अतः मैं तो आपके पवित्र चरणकमलको धोकर ही नावपर चढ़ाऊँगा; कहिये, क्या आज्ञा है ? गोसाईंजी कहते हैं कि केवटके ये श्रेष्ठ [ चतुरताके ] वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी जानकीजीकी ओर देखकर ठहाका मारकर हँसे ।