कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५ अयोध्याकाण्ड पात भरी सहरी, सकल सुत वारे-बारे, केवटकी जाति, कछु वेद न पढ़ाइहौं। सबु परिवारु मेरो याहि लागि, राजा जू, हौं दीन बित्तहीन, कैसें दूसरी गढ़ाइहौं ॥ गौतमकी घरनी ज्यों तरनी तरेगी मेरी, प्रभुसों निषादु ह्वै कै बादु ना बढ़ाइहौं। तुलसीके ईस राम, रावरे सों साँची कहौं, बिना पग धोएँ नाथ, नाव ना चढ़ाइहौं ॥ ८ ॥ घरमें पत्तलभर मछलीके सिवा और कुछ नहीं है और बच्चे सब छोटे-छोटे हैं [ अभी कमाने योग्य नहीं हैं ] । जातिका मैं केवट हूँ, उन्हें कुछ वेद तो पढ़ाऊँगा नहीं । राजाजी ! मेरा तो सारा परिवार इसीके आश्रय है, तथा मैं धनहीन और दरिद्र हूँ, दूसरी नौका भी कहाँसे बनवाऊँगा । यदि गौतमकी स्त्रीके समान मेरी यह नाव भी तर गयी तो हे प्रभो ! जातिका निषाद होकर मैं आपसे बात भी नहीं बढ़ा सकूँगा ( झगड़ नहीं सकूँगा ) । हे नाथ ! हे तुलसीश राम ! आपसे मैं सच कहता हूँ, बिना पैर धोये आपको नावपर नहीं चढ़ाऊँगा । जिन्हको पुनीत बारि धारैं सिरपै पुरारि, त्रिपथगामिनि-जसु वेद कहैं गाइकै। जिन्हको जोगींद्र मुनि बृंद देव देह दमि, करत बिबिध जोग-जप मनु लाइकै॥ तुलसी जिन्हकी धूरि परसि अहल्या तरी, गौतम सिधारे गृह गौनो-सो लेवाइकै।