कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२५ अयोध्याकाण्ड पात भरी सहरी, सकल सुत वारे-बारे, केवटकी जाति, कछु वेद न पढ़ाइहौं। सबु परिवारु मेरो याहि लागि, राजा जू, हौं दीन बित्तहीन, कैसें दूसरी गढ़ाइहौं ॥ गौतमकी घरनी ज्यों तरनी तरेगी मेरी, प्रभुसों निषादु ह्वै कै बादु ना बढ़ाइहौं। तुलसीके ईस राम, रावरे सों साँची कहौं, बिना पग धोएँ नाथ, नाव ना चढ़ाइहौं ॥ ८ ॥ घरमें पत्तलभर मछलीके सिवा और कुछ नहीं है और बच्चे सब छोटे-छोटे हैं [ अभी कमाने योग्य नहीं हैं ] । जातिका मैं केवट हूँ, उन्हें कुछ वेद तो पढ़ाऊँगा नहीं । राजाजी ! मेरा तो सारा परिवार इसीके आश्रय है, तथा मैं धनहीन और दरिद्र हूँ, दूसरी नौका भी कहाँसे बनवाऊँगा । यदि गौतमकी स्त्रीके समान मेरी यह नाव भी तर गयी तो हे प्रभो ! जातिका निषाद होकर मैं आपसे बात भी नहीं बढ़ा सकूँगा ( झगड़ नहीं सकूँगा ) । हे नाथ ! हे तुलसीश राम ! आपसे मैं सच कहता हूँ, बिना पैर धोये आपको नावपर नहीं चढ़ाऊँगा । जिन्हको पुनीत बारि धारैं सिरपै पुरारि, त्रिपथगामिनि-जसु वेद कहैं गाइकै। जिन्हको जोगींद्र मुनि बृंद देव देह दमि, करत बिबिध जोग-जप मनु लाइकै॥ तुलसी जिन्हकी धूरि परसि अहल्या तरी, गौतम सिधारे गृह गौनो-सो लेवाइकै।
· कवितावली २६ तेई पाय पाइकै चढ़ाइ नाव धोए बिनु, खवैहौं न पठावनी कै ह्वैहौं न हँसाइ कै ॥९॥ जिन चरणोंके (धोवनरूप) पवित्र जल—श्रीगङ्गाजीको शिवजी अपने सिरपर धारण करते हैं, जिन (गङ्गाजी) के यशका वेद भी गा-गाकर वर्णन करते हैं; जिनके लिये योगीश्वर, मुनिगण और देवतालोग देहका दमन कर, मन लगाकर अनेक प्रकारके योग और जप करते हैं; गोसाईंजी कहते हैं, जिनकी धूलिको स्पर्शकर अहल्या तर गयी और गौतमजी गौनेके समान अपनी स्त्रीको लिवाकर घर चले गये; उन्हीं चरणोंको पाकर बिना धोये नावपर चढ़ाकर मैं अपनी मजूरी नहीं खोऊँगा और न अपनी हँसी कराऊँगा। प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि, वंदि कै चरन चहूँ दिसि बैठे घेरि-घेरि। छोटो-सो कठौता भरि आनि पानी गंगाजूको, धोइ पाय पीअत पुनीत वारि फेरि-फेरि॥ तुलसी सराहें ताको भागु, सानुराग सुर बरषैं सुमन, जय-जय कहैं टेरि-टेरि। विविध सनेह-सानी बानी असयानी सुनि, हँसैं राघौ जानकी-लखन तन हेरि-हेरि ॥१०॥ श्रीरामचन्द्रजीका रुख देख केवटने अपने लड़के और स्त्रीको बुलाया। वे सब प्रभुके चरणोंकी वन्दना कर चारों ओरसे उन्हें घेरकर बैठ गये। पुनः छोटे-से काठके कठौतेमें गङ्गाजीका जल लाया और चरण धोकर उस पवित्र जलको बार-बार पीने लगा।
२७ अयोध्याकाण्ड गोसाईंजी कहते हैं कि देवतालोग केवटके भाग्यकी बड़ाई कर प्रेम- सहित फूल बरसाने और पुकार-पुकारकर जय-जयकार करने लगे । (केवटपरिवारकी) नाना प्रकारकी प्रेमभरी भोली-भाली बातोंको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देख-देखकर हँसते हैं । वनके मार्गमें पुरतें निकसी रघुबीरवधू, धरि धीर दए मगमें डग द्वै । झलकीं भरि भाल कनीं जलकी, पुट सूखि गए मधुराधर वै ॥ फिरि बूझति हैं, चलनौ अब केतिक, पर्णकुटी करिहौं कित ह्वै ?। तियकी लखि आतुरता पियकी अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै॥ रघुवीरप्रिया श्रीजानकीजी जब नगरसे बाहर हुईं तो वे धैर्य धारणकर मार्गमें दो डग चलीं । इतनेहीमें (सुकुमारताके कारण) उनके ललाटपर जलके कण (पसीनेकी बूँदें) भरपूर झलकने लगे और दोनों मधुर अधरपुट सूख गये । वे घूमकर पूछने लगीं-- 'हे प्रिय ! अब कितनी दूर और चलना है और कहाँ चलकर पर्णकुटी बनाइयेगा ?' पत्नीकी ऐसी आतुरता देख प्रियतमकी अति मनोहर आँखोंसे जल बहने लगा । जलको गए लखनू, हैं लरिका, परिखौ, पिय ! छाहँ घरीक ह्वै ठाढ़े । पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े ॥ तुलसी रघुबीर प्रियाश्रम जानि कै बैठि विलंब लौं कंटक काढ़े ।
कवितावली २८ जानकीं नाहको नेहु लख्यो, पुलको तनु, बारि बिलोचन बाढ़े ॥१२॥ श्रीजानकीजी कहती हैं, 'प्रियतम ! लक्ष्मणजी बालक हैं, वे जल लाने गये हैं सो कहीं छाँहमें एक घड़ी खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कीजिये ! मैं आपके पसीने पोंछकर हवा करूँगी और गरम बालूसे जले हुए चरणोंको धोऊँगी।' प्रियाकी थकावटको जानकर श्रीरामचन्द्रजीने बैठकर बड़ी देरतक उनके पैरोंके काँटे निकाले। जब जानकीजीने अपने प्राणप्रियके प्रेमको देखा तो उनका शरीर आनन्दसे रोमाञ्चित हो गया और नेत्रोंमें आँसू भर आये। ठाढ़े हैं नवद्रुमडार गहें, धनु काँधैं धरें, कर सायकु लैं। बिकटी भृकुटी, बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छबि हैं॥ तुलसी अस मूरति आनु हिएँ, जड ! डारु धौं प्रान निछावरि कै। श्रमसीकर साँवरि देह लसै, मनो रासि महा तम तारकमै ॥१३॥ किसी नवीन वृक्षकी डालको पकड़े हुए ( श्रीरामचन्द्रजी ) खड़े हैं। वे कंधेपर धनुष धारण किये हुए हैं और हाथमें बाण लिये हुए हैं; उनकी भृकुटी टेढ़ी है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं और कपोलोंकी शोभा अनमोल है। पसीनेकी बूँदोंसे साँवला शरीर ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो तारोंसे युक्त महान् तमोराशि हो। गोसाईंजी
२९ अयोध्याकाण्ड कहते हैं—रे जड़ ! ऐसी मूर्तिको प्राण निछावर करके भी हृदयमें बसा। जलजनयन, जलजानन, जटा है सिर, जौबन-उमंग अंग उदित उदार हैं। साँवरे-गोरेके बीच भामिनी सुदामिनी-सी, मुनिपट धारैं, उर फूलनिके हार हैं॥ करनि सरासन-सिलीमुख, निषंग कटि, अतिही अनूप काहू भूपके कुमार हैं। तुलसी बिलोकि कै तिलोकके तिलक तीनि, रहे नरनारि ज्यों चितेरे चित्रसार हैं ॥१४॥ [मार्गके गाँवोंके नर-नारी श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको देखकर आपसमें इस प्रकार बातें करते हैं—] इनके नेत्र कमलके समान हैं तथा मुख भी कमलके ही सदृश हैं। इनके सिरपर जटाएँ हैं और प्रशस्त अङ्गोंमें यौवनकी उमंग झलक रही है। साँवरे (श्रीरामचन्द्र) और गोरे (लक्ष्मणजी) के मध्यमें बिजलीके समान आभावाली एक रमणी सुशोभित है। ये (तीनों) मुनियोंके वस्त्र धारण किये हैं, और इनके हृदयमें फूलोंकी मालाएँ हैं। हाथोंमें धनुष-बाण लिये और कमरमें तरकस कसे ये किसी राजाके अत्यन्त ही अनुपम कुमार हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि त्रिलोकीके इन तीन तिलकोंको देखकर वे नर-नारी ऐसे स्तब्ध रह गये मानो चित्रशाला- के चित्र हों। आगें सीहै साँवरो कुँवरु गोरो पाछें-पाछें, आछे मुनिबेष धरें, लाजत अनंग हैं।
कवितावली ३० बान-बिसिखासन, बसन बनही के कटि कसे हैं बनाइ, नीके राजत निषंग हैं ॥ साथ निसिनाथमुखी पाथनाथनंदिनी-सी, तुलसी बिलोकें चितु लाइ लेत संग हैं। आनँद उमंग मन, जौवन-उमंग तन, रूपकी उमंग उमगत अंग-अंग है ॥१५॥ आगे-आगे साँवरे और पीछे-पीछे गोरे राजकुमार सुन्दर मुनिवेश धारण किये सुशोभित हैं, जिन्हें देखकर कामदेव भी लज्जित होता है। वे धनुष-बाण लिये हैं और वनके वस्त्र धारण किये हैं। कमरमें भी वनके ही वस्त्र अच्छी तरह कसे हुए हैं और सुन्दर तरकस भी सुशोभित हैं। साथमें समुद्रसुता लक्ष्मीके समान एक चन्द्रमुखी हैं। गोसाईंजी कहते हैं, वे तीनों देखनेसे मनको सग लगा लेते हैं। उनके मनमें आनन्दकी उमंग है, शरीरमें यौवनकी उमंग है और रूपकी उमंग अङ्ग-अङ्गमें उमँग रही है। सुंदर बदन, सरसीरुह सुहाए नैन, मंजुल प्रसून माथें मुकुट जटनि के। अंसनि सरासन, लसत सुचि सर कर, तून कटि, मुनिपट लूतक पटनि के॥ नारि सुकुमारि संग, जाके अंग उबटि कै विधि बिरचैं बरूथ बिद्युतछटनि के। गोरेको वरनु देखें सोनो न सलोनो लागै, साँवरे बिलोकें गर्ब घटत घटनि के ॥१६॥
३१ अयोध्याकाण्ड उनका सुन्दर मुख है, कमलके समान सुहावने नेत्र हैं और मस्तकपर जटाओंके मुकुट हैं जिनमें सुन्दर फूल खोंसे हुए हैं। कन्धोंपर धनुष, हाथोंमें सुन्दर बाण, कमरमें तरकस और वस्त्रोंकी शोभाको लूटनेवाले मुनिवस्त्र सुशोभित हैं। उनके साथ एक सुकुमारी नारी है, जिसके अङ्गोंमें उबटन लगाकर [ उसके मैलसे ] ब्रह्माने विद्युच्छटाके समूह रचे हैं। गोरे ( लक्ष्मणजी ) के रंगको देखनेपर सोना सुहावना नहीं मालूम होता और साँवरे कुँवरको देखनेसे श्याम मेघोंका गर्व घट जाता है। बलकल-बसन, धनु-बान पानि, तून कटि, रूपके निधान घन-दामिनी-बरन हैं। तुलसी सुतीय संग, सहज सुहाए अंग, नवल कँवलहू तें कोमल चरन हैं॥ औरै सो बसंत, और रति, औरै रतिपति, मूरति बिलोकें तन-मनके हरन हैं। तापस-बेषै बनाइ पथिक पथै सुहाइ, चले लोकलोचननि सुफल करन हैं॥१७॥ वल्कलवस्त्र धारण किये, हाथोंमें धनुष-बाण लिये, कमरमें तरकस कसे दोनों राजकुमार रूपके राशि तथा क्रमशः मेघ और बिजलीके रंगके हैं। साथमें सुन्दरी स्त्री है, अङ्ग स्वाभाविक ही सलोने हैं और चरण नवीन कमलसे भी अधिक कोमल हैं। लक्ष्मणजी मानो दूसरे वसन्त, सीताजी दूसरी रति और श्रीराम दूसरे कामदेव हैं; उनकी मूर्तियाँ अवलोकन करनेसे तन-मनको हरनेवाली हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो ये तीनों ( वसन्त, रति
कवितावली ३२ और काम) सुन्दर तपस्वियोंका वेष बनाये पथिकरूपसे मार्गमें लोगोंके नेत्रोंको सफल करने चले हैं। बनिता बनी स्यामल गौरके बीच, बिलोकहु, री सखि ! मोहि-सी है। मगजोगु न कोमल, क्यों चलिहै, सकुचाति मही पदपंकज छ्वै॥ तुलसी सुनि ग्रामवधू थिथकीं, पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै। सब भाँति मनोहर मोहनरूप अनूप हैं भूपके बालक द्वै॥१८॥ [एक ग्रामीण स्त्री अन्य स्त्रियोंसे कहती है-] 'अरी सखि! साँवरे और गोरे कुँवरके बीचमें एक स्त्री विराजमान है, उसे तनिक मेरे समान होकर देखो। वह बड़ी कोमल है, मार्गमें चलनेयोग्य नहीं है कैसे चलेगी। फिर इसके (कोमल) चरणकमलोंका स्पर्श करके तो पृथ्वी भी सकुचाती है।' गोसाईंजी कहते हैं कि उसकी बातें सुनकर सब ग्रामकी स्त्रियाँ थकित हो गयीं, उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंसे जल बहने लगा। [सब कहने लगीं कि] ये दोनों राजकुमार सब प्रकार मनोहर, मोह लेनेवाले और अनुपम सुन्दर हैं। साँवरे-गोरे सलोने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है। बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु कियो है॥ संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रूपु दियो हैं। पायन तौ पनहीं न, पयादेंहि क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है।१९।
२. अयोध्याकाण्ड (वन गमन व निषाद मिलन)
३३ अयोध्याकाण्ड ये श्याम और गौरवर्ण बालक स्वभावसे ही सुन्दर हैं, इन्होंने मनोहरतामें कामदेवको भी जीत लिया है । ये धनुष-बाण लिये और तरकस कसे हुए हैं, इनके सिरपर जटाएँ सुशोभित हैं और इन्होंने मुनियोंका-सा वेष बना रखा है । साथमें चन्द्र- बदनी स्त्रीको लिये हैं, जिसने रतिको अपना थोड़ा-सा रूप दे रक्खा है । [ इन्हें देखकर ] हृदय सकुचाता है कि इनके पैरोंमें जूते भी नहीं हैं, ये पैदल कैसे चलेंगे ? रानी मैं जानी अयानी महा, पबि-पाहनहू तें कठोर हियो है। राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहि कान कियो है॥ ऐसी मनोहर मूरति ए, बिछुरें कैसे प्रीतम लोगु जियो है। आँखिनमें सखि ! राखिबे जोगु, इन्हें किमि कैबनबासु दियो है २० मैंने जान लिया कि रानी महामूर्ख है, उसका हृदय वज्र और पत्थरसे भी कठोर है । राजाको भी कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रहा, जिन्होंने स्त्रीके कहे हुएपर कान दिया । अरे ! इनकी मूर्ति ऐसी मनोहारिणी है; भला इन लोगोंका वियोग होने- पर इनके प्रिय लोग कैसे जीते होंगे ? हे सखि ! ये तो आँखोंमें रखने योग्य हैं; इन्हें वनवास क्यों दिया गया है ? सीस जटा, उर-बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी-सी भौंहैं। तून सरासन-बान धरें तुलसी वन-मारगमें सुठि सोहैं ॥ सादर बारहिं बार सुभायँ चितै तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं। पूँछति ग्रामबधू सिय सों, कहौ, साँवरे-से, सखि रावरे को हैं २१ तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीसीताजीसे गाँवकी स्त्रियाँ पूछती हैं—'जिनके सिरपर जटाएँ हैं, वक्षःस्थल और भुजाएँ विशाल हैं, नेत्र अरुणवर्ण हैं, भौंहें तिरछी हैं, जो धनुष-बाण क० ३—
कवितावली ३४ और तरकस धारण किये वनके मार्गमें बड़े भले जान पड़ते हैं और स्वभावसे ही आदरपूर्वक बार-बार तुम्हारी ओर देखकर जो हमारा मन मोह लेते हैं, बताओ तो वे साँवले-से कुँवर आपके कौन होते हैं?' सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी हैं जानकीं जानी भली । तिरछे करि नैन, दै सैन, तिन्हैं समुझाइ कछू, मुसुकाइ चली ॥ तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचनलाहु अलीं । अनुराग-तड़ागमें भानु-उदैं विगसीं मनो मंजुल कंजकलीं ।२२। (गाँवकी स्त्रियोंके) अमृत-से सने हुए सुन्दर वचनोंको सुनकर जानकीजी जान गयीं कि ये सब बड़ी चतुरा हैं। अतः नेत्रोंको तिरछा कर उन्हें सैनसे ही कुछ समझाकर मुसकराकर चल दीं । गोसाईंजी कहते हैं कि उस समय लोचनके लाभरूप श्रीरामचन्द्रजी- को देखती हुई वे सब सखियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं, मानो सूर्यके उदयसे प्रेमरूपी तालाबमें कमलोंकी मनोहर कलियाँ खिल गयी हैं। [अर्थात् श्रीरामचन्द्ररूपी सूर्यके उदयसे प्रेमरूपी सरोवरमें सखियोंके नेत्र कमलकलीके समान विकसित हो गये ।] धरि धीर कहैं, चलु, देखिअ जाइ, जहाँ सजनी ! रजनी रहिहैं । कहिहै जगु पोच, न सोचु कछू, फलु लोचन आपन तौ लहिहैं ॥ सुखु पाइहैं कान सुनैं बतियाँ कल, आपसमें कछु पै कहिहैं। तुलसी अति प्रेम लगीं पलकैं, पुलकीं लखि रामु हिये महि हैं।२३। वे सखियाँ धीरज धारण कर (परस्पर) कहती हैं, 'हे सजनी ! चलो, रातको जहाँ ये रहेंगे उस स्थानको जाकर देखें।
३५ अयोध्याकाण्ड यदि संसार हमलोगोंको खोटा भी कहेगा तो कुछ परवा नहीं ! नेत्र तो अपना फल पा जायँगे और कान इनकी सुन्दर बातोंको सुनकर सुख पावेंगे । ( हमसे नहीं तो ) आपसमें तो अवश्य ही कुछ कहेंगे ही।' गोसाईंजी कहते हैं, अत्यन्त प्रेमसे उनकी आँखें बंद हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें देखकर वे पुलकित हो गयीं । पद कोमल, स्यामल-गौर कलेवर राजत कोटि मनोज लजाएँ । कर बान-सरासन, सीस जटा, सरसीरुह-लोचन सोन सुहाए ॥ जिन्ह देखे सखी ! सतिभायहु तें तुलसी तिन्ह तौ मन फेरि न पाए एहिं मारग आजु किसोर बधू बिधुबैनी समेत सुभायँ सिधाए।२४। [ वे दूसरी स्त्रियोंसे कहने लगीं— ] अरी सखि ! आज एक चन्द्रवदनी बालाके सहित दो कुमार स्वभावसे ही इस मार्गसे गये हैं। उनके चरण बड़े कोमल थे तथा श्याम और गौर शरीर करोड़ों कामदेवोंको लज्जित करते हुए सुशोभित हो रहे थे । उनके हाथमें धनुष-बाण थे, सिरपर जटाएँ थीं तथा कमलके समान अरुणवर्ण नेत्र बड़े ही शोभायमान थे । जिन्होंने उन्हें सद्भावसे भी देख लिया, वे फिर उनकी ओरसे अपने मनको नहीं लौटा सके । मुखपंकज, कंजबिलोचन मंजु, मनोज-सरासन-सी बनीं भौंहैं । कमनीय कलेवर कोमल स्यामल-गौर किसोर, जटा सिर सोहैं ॥ तुलसी कटि तून, धरें धनु-बान, अचानक दिष्टि परी तिरछौंहैं । केहि भाँति कहौं सजनी ! तोहि सों, मृदु मूरति द्वै निवसीं मन मोहैं
कवितावली ३६ उनके मुख कमलके समान और नेत्र भी कमलके ही समान सुन्दर थे तथा भौंहें कामदेवके धनुषके समान बनी हुई थीं। उनके अति सुन्दर और सुकुमार श्याम-गौर शरीर थे, किशोर अवस्था थी एवं सिरपर जटाएँ सुशोभित थीं तथा वे कमरमें तरकस कसे और धनुष-बाण लिये थे । जिस समयसे अचानक ही उनकी तिरछी निगाह मुझपर पड़ी है, अरी सखि ! तुझसे किस प्रकार कहूँ, वे दोनों मृदुल मूर्तियाँ मेरे मनमें बसकर मोहित कर रही हैं। वनमें प्रेमसों पीछें तिरीछें प्रियाहि चितै चितु दै चले लै चितु चोरें । स्याम सरीर पसेउ लसै, हुलसै 'तुलसी' छबि सो मन मोरें ॥ लोचन लोल, चलैं भुकुटीं कल काम-कमानहु सो तृनु तोरैं । राजत रामु कुरंगके संग निषंगु कसें, धनुसों सरु जोरैं ॥ ( श्रीराम ) पीछेकी ओर प्रेमपूर्वक तिरछी दृष्टिसे दत्तचित्तसे प्रियाकी ओर निहारकर उनका चित्त चुराकर (आखेटको) चले। तुलसीदासजी कहते हैं- (प्रभुके) श्याम शरीरमें पसीना सुशोभित है, वह छबि मेरे हृदयमें हुलास भर देती है। प्रभुके नेत्र चञ्चल हैं और सुन्दर भौंहें चलायमान हो रही हैं, जिन्हें देखकर कामदेव- की जो कमान है वह भी तृण तोड़ती अर्थात् लज्जित होती है। इस प्रकार तरकस बाँधे तथा धनुषपर बाण चढ़ाये भगवान् राम हरिणके साथ (दौड़ते हुए) बड़े ही सुशोभित हो रहे हैं। सर चारिक चारु बनाइ कसें कटि, पानि सरासनु सायकु लै । बन खेलत रामु फिरैं मृगया, 'तुलसी' छबि सो बरनै किमि कै ॥
३७ अयोध्याकाण्ड अवलोकि अलौकिक रूपु मृगीं मृग चौंकि चकें, चितवैं चितु दै । न डगैं, न भगैं जियँ जानि सिलीमुख पंच धरैं रतिनायकु है ॥ श्रीरामचन्द्रजी वनमें शिकार खेलते फिरते हैं । उन्होंने दो- चार सुन्दर बाण बड़ी सुघरतासे कमरमें खोंस रक्खे हैं तथा हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उस शोभाका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके अलौकिक रूपको देखकर मृग और मृगी चौंककर चकित हो जाते हैं और चित्त लगाकर देखने लगते हैं । वे यह जानकर कि पाँच बाण धारण किये साक्षात् कामदेव ही हैं, न तो हिलते हैं और न भागते ही हैं । बिंधिके बासी उदासी तपी ब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे । गौतमतीय तरी 'तुलसी', सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे ॥ है हैं सिला सब चंद्रमुखीं परसें पद मंजुल कंज तिहारे । कीन्ही भली रघुनायकजू ! करुना करि काननको पगु धारे ॥ विन्ध्यपर्वतपर रहनेवाले महाव्रतधारी उदासी और तपस्वी लोग बिना स्त्रीके दुखी थे । वे मुनिगण यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए कि इनके कारण गौतमकी स्त्री अहल्या तर गयी, [ और बोले ] अब सब पत्थर आपके सुन्दर चरण-कमलोंके स्पर्शसे चन्द्रमुखी स्त्री हो जायँगे । हे रघुनन्दनजी ! आपने अच्छा किया जो कृपाकर वनमें पधारे । इति अयोध्याकाण्ड
अरण्यकाण्ड —:-०००००-:— मारीचानुधावन पंचवटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए । सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै, 'तुलसी' सब अंग घने छबि-छाए ॥ देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बैन, ते प्रीतमके मन भाए । हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए ॥ पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके समीप स्वभावसे ही सुन्दर श्रीरामचन्द्रजी बैठे हैं । ( साथमें ) प्रिया ( श्रीजानकीजी ) और प्रिय बन्धु शोभित हैं । गोसाईं जी कहते हैं—उनके सब अङ्ग बड़े ही शोभायमान हैं । उस समय एक ( सोनेके ) मृगको देखकर मृगनयनी ( श्रीजानकीजी ) ने [ उसे लानेके लिये ] जो प्रिय वचन कहे वे प्रियतमके मनको बहुत प्रिय लगे, तब रघुनाथजी धनुष-बाण ले उस सोनेके मृगके पीछे दौड़ पड़े । इति अरण्यकाण्ड —:-०००००-:—
किष्किन्धाकाण्ड —————— समुद्रोल्लङ्घन जब अंगदादिनकी मति-गति मंद भई, पवनके पूतको न कूदिबेको पलु गो। साहसी है सैलपर सहसा सकेलि आइ, चितवत चहूँ ओर, औरनिको कलु गो॥ 'तुलसी' रसातलको निकसि सलिलु आयो, कोलु कलमल्यो, अहि कमठको बलु गो। चारिहू चरनके चपेट चाँपें चिपिटि गो, उचकें उचकि चारि अंगुल अचलु गो॥१॥ जब अङ्गदादि वानरोंकी गति और बुद्धि मन्द पड़ गयी [अर्थात् किसीने पार जाना स्वीकार नहीं किया] तब वायुकुमार हनुमान्जीको कूदनेमें पलमात्रकी भी देरी नहीं हुई। वे साहसपूर्वक सहसा कौतुकसे ही पर्वतपर आ चारों ओर देखने लगे। इससे शत्रुओंकी शान्ति भंग हो गयी। गोसाईं जी कहते हैं कि रसातलसे जल निकल आया, वाराह भगवान् कलमला गये तथा शेष और कच्छप बलहीन हो गये। चारों चरणोंसे जोरसे दबानेसे पर्वत पृथ्वीमें चिपट गया और फिर उनके कूदनेपर पर्वत भी चार अंगुल उचक गया। इति किष्किन्धाकाण्ड ——————
सुन्दरकाण्ड अशोकवन बासव-बरुन-विधि-बनतें सुहावनो दसाननको काननु बसंतको सिंगारु सो । समय पुराने पात परत, डरत बातु, पालत लालत रति-मारको विहारु सो ॥ देखें बर वापिका तड़ाग बागको बनाउ, • रागवस भो विरागी पवनकुमारु सो । सीयकी दसा विलोकि बिटप असोक तर, 'तुलसी' विलोक्यो सो तिलोक-सोक-सारु सो॥१॥ गोसाईंजी कहते हैं कि रावणका वन इन्द्र, वरुण और ब्रह्माके वनसे भी अधिक सुहावना था । वह मानो वसन्तका श्रृङ्गार ही था । (तात्पर्य यह कि सब वन और उपवनोंका शृङ्गार वसन्त ऋतु है परन्तु रावणका बाग वसन्त ऋतुकी भी शोभा बढ़ानेवाला था । ) पुराने पत्ते (पतझड़के) समय ही गिरते हैं; क्योंकि वायु यहाँ आते हुए डरता था और उसके बागका लालन-पालनं रति और कामदेवके विहार-स्थलके समान करता था । उत्तम बावली, तालाब और बागकी बनावट देखकर हनुमान्जी-जैसे वैराग्यवान् भी रागके वशीभूत-से हो गये । (किन्तु) जब उन्होंने अशोक वृक्षके तले श्रीजानकीजीकी
दशा देखी तो उन्हें वह बाग तीनों लोकोंके शोकका सार-सा दिखायी दिया । माली मेघमाल, बनपाल बिकराल भट, नीकें सब काल सींचैं सुधासार नीरके। मेघनाद तें दुलारो, प्रान तें पिआरो बागु, अति अनुरागु जियँ जातुधान धीर कें ॥ ‘तुलसी’ सो जानि-सुनि, सीयको दरसु पाइ, पैठो बाटिकाँ बजाइ बल रघुबीर कें। बिद्यमान देखत दसाननको काननु सो तहस-नहस कियो साहसी समीर कें ॥ २ ॥ वहाँ मेघोंके समूह माली हैं और बड़े-बड़े बिकराल भट उस बागके रक्षक हैं। वे सब समय अमृतके सार-सदृश मीठे जलसे उसे अच्छी प्रकार सींचते हैं। धीर-बीर रावणके चित्तमें उस बागके प्रति अत्यन्त अनुराग था। उसे वह मेघनादसे भी अधिक दुलारा और प्राणोंसे भी अधिक प्यारा था। गोसाईंजी कहते हैं—यह सब जान- सुनकर भी श्रीहनुमान्जी जानकीजीका दर्शन पा श्रीरामचन्द्रजीके बलसे बागमें निःशङ्क घुस गये; और रावणके रहते और देखते हुए भी साहसी वायुनन्दनने उस वनको तहस-नहस कर दिया। लंकादहन बसन बटोरि बोरि-बोरि तेल तमीचर, खोरि-खोरि धाइ आइ बाँधत लँगूर हैं।
कवितावली ४२ तैसो कपि कौतुकी डेरात ढीले गात कै-कै, लातके अघात सहै, जीमें कहै, कूर हैं ॥ बाल किलकारी कै-कै, तारी दै-दै गारी देत, पाछें लागे, बाजत निसान ढोल तूर हैं। बालधी बढ़न लागी, ठौर-ठौर दीन्ही आगी, बिंधिकी दवारि कैधौं कोटिसत सूर हैं ॥ ३ ॥ राक्षस लोग गली-गली दौड़कर, कपड़े बटोरकर और उन्हें तेलमें डुबा-डुबाकर आकर हनुमान्जीकी पूँछमें बाँधते हैं। वैसे ही खिलाड़ी हनुमान्जी भी डरते हुए-से शरीरको ढीला कर-करके उनकी लातोंके आघात सहन करते हैं और मन-ही-मन कहते हैं कि ये सब कायर हैं। बालक किलकारी मारकर ताली बजा-बजाकर गाली देते हुए पीछे लगे हैं, तथा नगाड़े, ढोल और तुरुही बजाये जा रहे हैं। पूँछ बढ़ने लगी और [राक्षसोंने उसमें] जहाँ-तहाँ आग लगा दी, जिससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो वह विन्ध्य पर्वतकी दावाग्नि हो अथवा सौ करोड़ सूर्य हों। लाइ-लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ, लघु ह्वै निबुकि गिरि मेरुतें बिसाल भो। कौतुकी कपीसु कूदि कनक-कँगूराँ चढ़्यो, रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो ॥ ‘तुलसी’ बिराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी, देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।
तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु, नख विकराल, मुखु तैसो रिस लाल भो ॥ ४ ॥ बालसमूह [पूँछमें] आग लगा-लगाकर जहाँ-तहाँ भाग गये और हनुमान्जी छोटे हो फंदेसे निकलकर फिर सुमेरु पर्वतसे भी विशाल हो गये। तदनन्तर खिलाड़ी हनुमान् कूदकर सोनेके कँगूरेपर चढ़ गये और वहाँसे उसी समय रावणके राजमहलपर चढ़कर खड़े हो गये। गोसाईंजी कहते हैं, (उस समय) वे आकाशमें अपनी लंबी पूँछ फैलाये हुए सुशोभित थे। उसको देखकर वीर लोग हहर (थर्रा) जाते थे; (उस समय) वे कालके समान भयङ्कर हो गये। वे तेजके पुञ्ज-से जान पड़ते थे, मानो करोड़ों अग्नि और सूर्य हैं। उनके नख बड़े विकराल थे और वैसे ही मुख भी क्रोधसे लाल हो रहा था। बालधी बिसाल बिकराल ज्वालजाल मानो लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है। कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥ 'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु, कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं, काननु उजारयो, अब नगरु प्रजारिहै ॥ ५ ॥ भयंकर ज्वालमालाके सहित विशाल पूँछ ऐसी जान पड़ती थी मानो लंकाको निगलनेके लिये कालने जीभ फैलायी है, अथवा मानो आकाशमार्गमें अनेकों धूमकेतु भरे हैं, अथवा वीररस-रूपी वीरने
कवितावली ५४ मानो तलवार निकाल ली है। गोसाईंजी कहते हैं कि यह इन्द्रधनुष है अथवा बिजलीका समूह है या सुमेरु पर्वतसे अग्निकी भारी नदी बह चली है। उसे देखकर राक्षस और राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं—यह वनको तो उजाड़ चुका, अब नगरको और जलावेगा।
जहाँ-तहाँ बुबुक विलोकि बुबुकारी देत, जरत निकेतु धावौ, धावौ, लागी आगि रे। कहाँ तातु, मातु, भ्रात-भगिनी, भामिनी-भाभी, ढोटा छोटे छोहरा अभागे भौंडे भागि रे ॥ हाथी छोरौ, घोरा छोरौ, महिष-वृषभ छोरौ, छेरी छोरौ, सोवै सो, जगावौ, जागि, जागि रे। 'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं, बार-बार कह्यौं, पिय ! कपिसों न लागि रे ॥ ६ ॥
जहाँ-तहाँ आगकी भभकको देखकर पुकार देते हैं—'अरे ! भागो, भागो। आग लग गयी है, घर जल रहा है। अरे अभागे ! माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री-भौजाइ, लड़के-बच्चे, कहाँ हैं ? अरे गँवार ! भाग, भाग। हाथी खोलो, घोड़ा खोलो, भैंस और बैल खोलो तथा बकरियोंको भी खोल दो। वह सोता है, उसे जगा दो। अरे जागो ! जागो !!' गोसाईंजी कहते हैं कि इस दशाको देखकर राक्षसस्त्रियाँ व्याकुल होकर अपने-अपने पतियोंसे कहती हैं—'हे प्रियतम ! हमने बार-बार कहा था कि इस बंदरके मुँह मत लगो।
देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि, कह्यो, धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं।