कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरकाण्ड अशोकवन बासव-बरुन-विधि-बनतें सुहावनो दसाननको काननु बसंतको सिंगारु सो । समय पुराने पात परत, डरत बातु, पालत लालत रति-मारको विहारु सो ॥ देखें बर वापिका तड़ाग बागको बनाउ, • रागवस भो विरागी पवनकुमारु सो । सीयकी दसा विलोकि बिटप असोक तर, 'तुलसी' विलोक्यो सो तिलोक-सोक-सारु सो॥१॥ गोसाईंजी कहते हैं कि रावणका वन इन्द्र, वरुण और ब्रह्माके वनसे भी अधिक सुहावना था । वह मानो वसन्तका श्रृङ्गार ही था । (तात्पर्य यह कि सब वन और उपवनोंका शृङ्गार वसन्त ऋतु है परन्तु रावणका बाग वसन्त ऋतुकी भी शोभा बढ़ानेवाला था । ) पुराने पत्ते (पतझड़के) समय ही गिरते हैं; क्योंकि वायु यहाँ आते हुए डरता था और उसके बागका लालन-पालनं रति और कामदेवके विहार-स्थलके समान करता था । उत्तम बावली, तालाब और बागकी बनावट देखकर हनुमान्जी-जैसे वैराग्यवान् भी रागके वशीभूत-से हो गये । (किन्तु) जब उन्होंने अशोक वृक्षके तले श्रीजानकीजीकी