भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

दशा देखी तो उन्हें वह बाग तीनों लोकोंके शोकका सार-सा दिखायी दिया । माली मेघमाल, बनपाल बिकराल भट, नीकें सब काल सींचैं सुधासार नीरके। मेघनाद तें दुलारो, प्रान तें पिआरो बागु, अति अनुरागु जियँ जातुधान धीर कें ॥ ‘तुलसी’ सो जानि-सुनि, सीयको दरसु पाइ, पैठो बाटिकाँ बजाइ बल रघुबीर कें। बिद्यमान देखत दसाननको काननु सो तहस-नहस कियो साहसी समीर कें ॥ २ ॥ वहाँ मेघोंके समूह माली हैं और बड़े-बड़े बिकराल भट उस बागके रक्षक हैं। वे सब समय अमृतके सार-सदृश मीठे जलसे उसे अच्छी प्रकार सींचते हैं। धीर-बीर रावणके चित्तमें उस बागके प्रति अत्यन्त अनुराग था। उसे वह मेघनादसे भी अधिक दुलारा और प्राणोंसे भी अधिक प्यारा था। गोसाईंजी कहते हैं—यह सब जान- सुनकर भी श्रीहनुमान्जी जानकीजीका दर्शन पा श्रीरामचन्द्रजीके बलसे बागमें निःशङ्क घुस गये; और रावणके रहते और देखते हुए भी साहसी वायुनन्दनने उस वनको तहस-नहस कर दिया। लंकादहन बसन बटोरि बोरि-बोरि तेल तमीचर, खोरि-खोरि धाइ आइ बाँधत लँगूर हैं।