कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ४२ तैसो कपि कौतुकी डेरात ढीले गात कै-कै, लातके अघात सहै, जीमें कहै, कूर हैं ॥ बाल किलकारी कै-कै, तारी दै-दै गारी देत, पाछें लागे, बाजत निसान ढोल तूर हैं। बालधी बढ़न लागी, ठौर-ठौर दीन्ही आगी, बिंधिकी दवारि कैधौं कोटिसत सूर हैं ॥ ३ ॥ राक्षस लोग गली-गली दौड़कर, कपड़े बटोरकर और उन्हें तेलमें डुबा-डुबाकर आकर हनुमान्जीकी पूँछमें बाँधते हैं। वैसे ही खिलाड़ी हनुमान्जी भी डरते हुए-से शरीरको ढीला कर-करके उनकी लातोंके आघात सहन करते हैं और मन-ही-मन कहते हैं कि ये सब कायर हैं। बालक किलकारी मारकर ताली बजा-बजाकर गाली देते हुए पीछे लगे हैं, तथा नगाड़े, ढोल और तुरुही बजाये जा रहे हैं। पूँछ बढ़ने लगी और [राक्षसोंने उसमें] जहाँ-तहाँ आग लगा दी, जिससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो वह विन्ध्य पर्वतकी दावाग्नि हो अथवा सौ करोड़ सूर्य हों। लाइ-लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ, लघु ह्वै निबुकि गिरि मेरुतें बिसाल भो। कौतुकी कपीसु कूदि कनक-कँगूराँ चढ़्यो, रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो ॥ ‘तुलसी’ बिराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी, देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।