भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु, नख विकराल, मुखु तैसो रिस लाल भो ॥ ४ ॥ बालसमूह [पूँछमें] आग लगा-लगाकर जहाँ-तहाँ भाग गये और हनुमान्‌जी छोटे हो फंदेसे निकलकर फिर सुमेरु पर्वतसे भी विशाल हो गये। तदनन्तर खिलाड़ी हनुमान् कूदकर सोनेके कँगूरेपर चढ़ गये और वहाँसे उसी समय रावणके राजमहलपर चढ़कर खड़े हो गये। गोसाईंजी कहते हैं, (उस समय) वे आकाशमें अपनी लंबी पूँछ फैलाये हुए सुशोभित थे। उसको देखकर वीर लोग हहर (थर्रा) जाते थे; (उस समय) वे कालके समान भयङ्कर हो गये। वे तेजके पुञ्ज-से जान पड़ते थे, मानो करोड़ों अग्नि और सूर्य हैं। उनके नख बड़े विकराल थे और वैसे ही मुख भी क्रोधसे लाल हो रहा था। बालधी बिसाल बिकराल ज्वालजाल मानो लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है। कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥ 'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु, कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं, काननु उजारयो, अब नगरु प्रजारिहै ॥ ५ ॥ भयंकर ज्वालमालाके सहित विशाल पूँछ ऐसी जान पड़ती थी मानो लंकाको निगलनेके लिये कालने जीभ फैलायी है, अथवा मानो आकाशमार्गमें अनेकों धूमकेतु भरे हैं, अथवा वीररस-रूपी वीरने