कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु, नख विकराल, मुखु तैसो रिस लाल भो ॥ ४ ॥ बालसमूह [पूँछमें] आग लगा-लगाकर जहाँ-तहाँ भाग गये और हनुमान्जी छोटे हो फंदेसे निकलकर फिर सुमेरु पर्वतसे भी विशाल हो गये। तदनन्तर खिलाड़ी हनुमान् कूदकर सोनेके कँगूरेपर चढ़ गये और वहाँसे उसी समय रावणके राजमहलपर चढ़कर खड़े हो गये। गोसाईंजी कहते हैं, (उस समय) वे आकाशमें अपनी लंबी पूँछ फैलाये हुए सुशोभित थे। उसको देखकर वीर लोग हहर (थर्रा) जाते थे; (उस समय) वे कालके समान भयङ्कर हो गये। वे तेजके पुञ्ज-से जान पड़ते थे, मानो करोड़ों अग्नि और सूर्य हैं। उनके नख बड़े विकराल थे और वैसे ही मुख भी क्रोधसे लाल हो रहा था। बालधी बिसाल बिकराल ज्वालजाल मानो लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है। कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥ 'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु, कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं, काननु उजारयो, अब नगरु प्रजारिहै ॥ ५ ॥ भयंकर ज्वालमालाके सहित विशाल पूँछ ऐसी जान पड़ती थी मानो लंकाको निगलनेके लिये कालने जीभ फैलायी है, अथवा मानो आकाशमार्गमें अनेकों धूमकेतु भरे हैं, अथवा वीररस-रूपी वीरने
कवितावली ५४ मानो तलवार निकाल ली है। गोसाईंजी कहते हैं कि यह इन्द्रधनुष है अथवा बिजलीका समूह है या सुमेरु पर्वतसे अग्निकी भारी नदी बह चली है। उसे देखकर राक्षस और राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं—यह वनको तो उजाड़ चुका, अब नगरको और जलावेगा।
जहाँ-तहाँ बुबुक विलोकि बुबुकारी देत, जरत निकेतु धावौ, धावौ, लागी आगि रे। कहाँ तातु, मातु, भ्रात-भगिनी, भामिनी-भाभी, ढोटा छोटे छोहरा अभागे भौंडे भागि रे ॥ हाथी छोरौ, घोरा छोरौ, महिष-वृषभ छोरौ, छेरी छोरौ, सोवै सो, जगावौ, जागि, जागि रे। 'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं, बार-बार कह्यौं, पिय ! कपिसों न लागि रे ॥ ६ ॥
जहाँ-तहाँ आगकी भभकको देखकर पुकार देते हैं—'अरे ! भागो, भागो। आग लग गयी है, घर जल रहा है। अरे अभागे ! माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री-भौजाइ, लड़के-बच्चे, कहाँ हैं ? अरे गँवार ! भाग, भाग। हाथी खोलो, घोड़ा खोलो, भैंस और बैल खोलो तथा बकरियोंको भी खोल दो। वह सोता है, उसे जगा दो। अरे जागो ! जागो !!' गोसाईंजी कहते हैं कि इस दशाको देखकर राक्षसस्त्रियाँ व्याकुल होकर अपने-अपने पतियोंसे कहती हैं—'हे प्रियतम ! हमने बार-बार कहा था कि इस बंदरके मुँह मत लगो।
देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि, कह्यो, धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं।
४५ सुन्दरकाण्ड लिएँ सूल-सेल, पास-परिघ, प्रचंड दंड, भाजन सनीर, धीर धरें धनु-बान हैं॥ 'तुलसी' समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि, जातुधान पुंगीफल जव तिल धान हैं। सुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि, स्वाहा महा हाँकि हाँकि हुनैं हनुमान हैं॥७॥ उस (धधकते हुए) अग्निसमूहको देख और लोगोंका हाहाकार सुन रावणने कहा 'अरे ! इसे पकड़ो ! इसे पकड़ो !!' यह सुनकर बहुत-से बलवान् योद्धा त्रिशूल, बर्छी, फाँसी, परिघ, मजबूत डंडे और पानी भरे हुए बरतन लिये दौड़े और कुछ धीर लोगोंने धनुष- बाण भी धारण कर रक्खे थे। श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि लंकाको यज्ञकुण्ड समझो और वहाँकी सामग्री लकड़ी हैं तथा राक्षसगण सुपारी, जौ, तिल और धान हैं। हनुमान्जीकी पूँछ सुवा है, बलवान् शत्रु हवि हैं और उच्च हाँकरूपी स्वाहामन्त्रद्वारा हनुमान्जी हवन कर रहे हैं। गाज्यो कपि गाज ज्यों, बिराज्यो ज्वालजालजुत, भाजे बीर धीर, अकुलाइ उठ्यो रावनो। धावौ, धावौ, धरौ, सुनि धाए जातुधान धारि, बारिधारा उलदै जलदु जौन सावनो॥ लपट-झपट झहराने, हहराने बात, भहराने भट, पर्यो प्रबल परावनो। ढकनि ढकेलि, पेलि सचिव चले लै ठेलि, नाथ ! न चलैगो बलु, अनलु भयावनो॥८॥
कवितावली ४६ हनुमान्जी धधकते हुए अग्निसमूहसे सुशोभित हुए और बादलकी भाँति गरजे । इससे बड़े धीर-वीर योद्धा भाग गये और रावण भी व्याकुल हो उठा और बोला, 'दौड़ो, दौड़ो, इसे पकड़ लो।' यह सुनकर राक्षसोंकी सेना दौड़ी, मानो सावनका बादल जल बरसा रहा हो। वे योध्यालोग आगकी लपटोंकी झपटसे झुलसकर और वायुके झकोरोंसे घबड़ाकर व्याकुल हो गये । इस प्रकार उस समय वहाँ भारी भगदड़ पड़ गयी । रावणको भी मन्त्रीलोग धक्कोंसे ढकेलकर और ज़बरदस्ती ठेलकर ले चले और कहने लगे-हे नाथ ! आग भयंकर है, इसमें बल नहीं चलेगा । बड़ो बिकराल बेषु देखि, सुनि सिंघनादु, उठ्यो मेघनादु, सविषाद कहै रावनो । बेग जित्यो मारुतु, प्रताप मारतंड कोटि, कालऊ करालताँ, बड़ाईं जित्यो बावनो ॥ 'तुलसी' सयाने जातुधान पछिताने कहैं, जाको ऐसो दूत, सो तो साहेबु अबै आवनो । काहेको कुसल रोषें राम बामदेवहू की, बिषम बलीसों बादि बैरको बढ़ावनो ॥ ९ ॥ हनुमान्जीका बड़ा भयंकर वेष देख और उनका सिंहनाद सुन मेघनाद उठा और रावण भी चिन्तायुक्त होकर बोला- इसने तो वेगमें वायुको, प्रतापमें करोड़ों सूर्योंको, करालतामें कालको और बड़ाई (विशालता) में भगवान् वामनको भी जीत लिया । तुलसीदासजी कहते हैं—उस समय जो समझदार राक्षस थे, वे पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे, 'जिसका दूत ऐसा (प्रचण्ड) है, वह स्वामी तो
४७ सुन्दरकाण्ड अभी आना बाकी ही है।' भला रामके क्रोधित होनेपर शिवजीकी भी कुशल कैसे हो सकती है ? ऐसे बाँके वीरसे वैर बढ़ाना व्यर्थ ही है। पानी ! पानी ! पानी ! सब रानी अकुलानी कहें, जाति हैं परानी, गति जानी गजचालि है। बसन बिसारैं, मनिभूषन सँभारत न, आनन सुखाने, कहैं, क्योंहू कोऊ पालिहै ॥ 'तुलसी' मंदोवै मीजि हाथ, धुनि माथ कहै, काहूँ कान कियो न, मैं कह्यो केतो कालि है। बापुरें बिभीषन पुकारि बार-बार कह्यो, बानरु बड़ी बलाइ घने घर घालिहै ॥१०॥ सब रानियाँ व्याकुल होकर 'पानी-पानी' चिल्लाती हैं और दौड़ी चली जा रही हैं। गजकी-सी चालसे ही उनकी गति पहचाननेमें आती है। वे वस्त्र लेना भूल गयी हैं और मणिजटित आभूषणोंको भी नहीं सँभाल सकी हैं। उनके मुख सूख रहे हैं और वे कहती हैं--'क्या किसी प्रकार भी कोई हमारी रक्षा करेगा?' गोसाईंजी कहते हैं-मन्दोदरी हाथ मल-मलकर और सिर धुन-धुनकर कहती है कि अहो ! कल मैंने कितना कहा, फिर भी किसीने उसपर कान नहीं दिया। बेचारे विभीषणने भी बार-बार पुकारकर कहा कि यह वानर बड़ी भारी बला है और बहुत-से घरोंको चौपट कर देगा। काननु उजारथो तो उजारथो, न बिगारथो कछु, बानरु बेचारो बाँधि आन्यो हठि हारसों ।
कवितावली ४८ निपट निडर देखि काहूँ न लख्यो बिसेषि, दीन्हो ना छुड़ाइ कहि कुलके कुठारसों ॥ छोटे औ बड़ेरे मेरे पूतऊ अनेरे सब, साँपनि सों खेलैं, मेलैं गरे छुराधार सों । 'तुलसी' मँदोवै रोइ-रोइ कै बिगोवै आपु, बार-बार कह्यो मैं पुकारि दाढ़ीजारसों ॥११॥ 'वनको उजाड़ा, तो उजाड़ा, उससे कुछ बिगाड़ नहीं हुआ था; किन्तु ये बेचारे इस बन्दरको उपवनसे हठात् बाँधकर ले आये । उसे बिल्कुल निडर देखकर भी किसीने कुछ विशेष नहीं समझा और न कुलकुठार मेघनादसे कहकर किसीने उसे छुड़ाया ही । मेरे छोटे बड़े सभी पुत्र अन्यायी हैं, ये साँपोंसे खेलवाड़ करते हैं और छूरेकी धारमें अपनी गर्दनें रखते हैं।' गोसाईंजी कहते हैं कि मन्दोदरी रो-रोकर अपनेको क्षीण करती है और कहती है कि मैंने इस दाढ़ीजार (मेघनाद) से बार-बार पुकारकर कहा (परन्तु इसने मेरी एक बात न सुनी) । रानीं अकुलानी सब डाढ़त परानी जाहिं, सकें न बिलोकि बेषु केसरीकुमारको । मीजि-मीजि हाथ, धुनैं माथ दसमाथ-तिय, 'तुलसी' तिलौ न भयो बाहेर अगारको ॥ सबु असबाबु डाढ़ो, मैं न काढ़ो, तैं न काढ़ो, जियकी परी, सँभारै सहन-भँडार को । खीझति मँदोवै सबिषाद देखि मेघनादु, बयो लूनिअत 'सब याही दाढ़ीजारको ॥१२॥
४९ सुन्दरकाण्ड रानियाँ सब जलती हुई घबड़ाकर दौड़ी चली जाती हैं। वे केशरीनन्दन (हनूमान्जी) के (विकराल) वेषको देख नहीं सकतीं। रावणकी स्त्रियाँ हाथ मल-मलकर रह जाती हैं और सिर धुन-धुनकर कहती हैं कि तिलभर वस्तु भी घरके बाहर नहीं हो सकी। सब असबाब जल गया, न मैंने ही निकाला और न तूने ही निकाला। सबको अपने-अपने जीकी पड़ी थी, घर-आँगन कौन सँभालता। मेघनादको देखकर मन्दोदरी दुःखपूर्वक क्रोधित होती है और कहती है कि इसी दाढ़ीजारका बोया हुआ सब काट रहे हैं [यदि यह इस बंदरको पकड़कर न लाता तो ऐसी आफत क्यों आती?] रावनकी रानीं बिलखानी कहैं जातुधानीं, हाहा! कोऊ कहै बीसबाहु दसमाथ सों। काहे मेघनाद! काहे, काहे रे महोदर! तूँ, धीरजु न देत, लाइ लेत क्यों न हाथसों॥ काहे अतिकाय! काहे, काहे रे अकंपन! अभागे तीय त्यागे भोंड़े भागे जात साथसों। 'तुलसी' बढ़ाई वादि सालतें बिसाल बाहें, याहीं बल बालिसो बिरोधु रघुनाथसों॥१३॥ राक्षसियाँ जो रावणकी रानियाँ थीं, बिलख-बिलखकर कहती हैं—'हाय! हाय!! कोई यह हाल बीस भुजा और दस सिरवाले रावणको सुनावे। क्यों रे मेघनाद! क्यों रे महोदर! तुम हमें धैर्य क्यों नहीं बँधाते और अपने हाथोंमें आश्रय क्यों नहीं देते? क्यों रे अतिकाय! क्यों रे अकम्पन! अरे अभागे गँवारो! क्यों स्त्रियोंको त्यागकर साथसे भागे जाते हो? तुमलोगोंने व्यर्थ ही क० ४---
कवितावली ५० सालवृक्षके समान बड़ी-बड़ी भुजाएँ बढ़ा रक्खी हैं ? अरे मूर्खों ! इसी बलसे रघुनाथजीसे वैर बढ़ाया है ?' हाट-बाट, कोट-ओट, अटनि, अगार, पौरि, खोरि-खोरि दौरि-दौरि दीन्ही अति आगि है। आरत पुकारत, सँभारत न कोऊ काहू, ब्याकुल जहाँ सो तहाँ लोक चले भागि हैं॥ बालधी फिरावै, बार-बार झहरावै, झरैं बुँदिया-सी, लंक पघिलाइ पाग पागि है। 'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं, चित्रहू के कपि सों निसाचरु न लागिहै ॥१४॥ (इस प्रकार हनुमान्जीने ) हाट-बाट, किले-प्राकार, अटारी, घर-दरवाजे और गली-गलीमें दौड़-दौड़कर भारी आग लगा दी। सब लोग आर्तनाद कर रहे हैं, कोई किसीको नहीं सँभालता। सब लोग व्याकुल होकर जहाँ-तहाँ भाग चले। हनुमान्जी पूँछको घुमाकर बार-बार झाड़ते हैं, उससे बुँदियाकी भाँति चिनगारियाँ झड़ रही हैं, मानो लङ्काको पिघलाकर उसकी चासनीमें उस बुँदियाको पागेंगे। यह देखकर राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं कि अब राक्षसलोग चित्रके वानरसे भी नहीं भिड़ेंगे। लगी, लागी आगि, भागि-भागि चले जहाँ-तहाँ, धीयको न माय, बाप पूत न सँभारहीं। छूटे बार, बसन उघारे, धूम-धुंद अंध, कहैं बारे-बूढ़े 'बारि, बारि' बार बारहीं ॥
५१ सुन्दरकाण्ड हय हिहिनात, भागे जात गहरात गज, भारी भीर ठेलि-पेलि रौंदि-खौंदि डारहीं। नाम लै चिलात, बिललात अकुलात अति, 'तात तात ! तौंसिअत, झौंसिअत, झारहीं' ॥१५॥ आग लग गयी, आग लग गयी, ऐसा पुकारते हुए सब लोग जहाँ-तहाँ भाग चले। न माँ लड़कीको सँभालती है और न पिता पुत्रको सँभालता है। केश और वस्त्र खुल गये हैं, सब लोग नंगे हो गये हैं, और धुएँकी धुंधसे अंधे होकर लड़के-बूढ़े सब बार-बार 'पानी-पानी' पुकार रहे हैं। घोड़े हिनहिनाते हुए भागे जाते हैं, हाथी चिग्घार मारते हैं और जो बड़ी भारी भीड़ लगी हुई थी, उसे धक्कोंसे ढकेलकर पैरोंसे कुचले डालते हैं। सब लोग नाम ले-लेकर पुकार रहे हैं, और अत्यन्त बिलबिलाते तथा अकुलाते हुए कहते हैं, 'बाप रे बाप ! आगकी लपटोंसे तो झुलसे जाते हैं, तपे जाते हैं।' लपट कराल ज्वालजालमाल दहूँ दिसि, धूम अकुलाने, पहिचानै कौन काहि रे। पानीको ललात, बिललात, जरे गात जात, परे पाइमाल जात 'भात ! तूँ निवाहि रे ॥ प्रिया ! तूँ पराहि, नाथ ! नाथ ! तूँ पराहि, बाप ! बाप ! तूँ पराहि, पूत ! पूत ! तूँ पराहि रे' । 'तुलसी' बिलोकि लोग ब्याकुल बेहाल कहैं, लेहि दससीस ! अब बीस चख चाहि रे ॥१६॥
कवितावली ५२ दसों दिशाओंमें ज्वालमालाओंकी भयंकर लपटें फैल गयी हैं । सब लोग धुएँसे व्याकुल हो रहे हैं । उस धूममें कौन किसे पहचान सकता था । लोग पानीके लिये लालायित होकर बिलबिला रहे हैं, शरीर जला जाता है, सब लोग तबाह हुए जाते हैं और कहते हैं—'भैया ! बचाओ ! प्रिये ! तुम भागो । हे नाथ ! हे नाथ ! भागो । पिताजी ! पिताजी ! दौड़ो । अरे बेटा ! ओ बेटा ! भाग ।' तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग व्याकुल और परेशान होकर कह रहे हैं—'अरे दशशीश रावण ! अब बीसों आँखोंसे अपनी करतूत देख ले ।' बीथिका-बज़ार प्रति, अटनि अगार प्रति, पवरि-पगार प्रति बानरु बिलोकिए । अध-ऊर्ध बानर, बिदिसि-दिसि बानरु है, मानो रह्यो है भरि बानरु तिलोकिएँ ॥ मूँदें आँखि हियमें, उघारें आँखि आगें ठाढ़ो, धाइ जाइ जहाँ-तहाँ, और कोऊ कोकिए । लेहु, अब लेहु, तब कोउ न सिखावो मानो, सोई सतराइ जाइ, जाहि-जाहि रोकिए ॥१७॥ [ हनुमान्जी ऐसी शीघ्रतासे घूम रहे हैं कि ] गली-गली, बाजार-बाजार, अटारी-अटारी, घर-घर, द्वार-द्वार, दीवार-दीवारपर वानर ही दिखायी पड़ रहा है । ऊपर-नीचे और दिशा-विदिशाओंमें वानर ही दीखता है, मानो वह वानर तीनों लोकोंमें भर गया है । आँख मूँदनेसे हृदयमें और आँख खोलनेसे आगे खड़ा दिखायी देता है । जहाँ और किसीको पुकारते हैं, वहाँ मानो हनुमान्जी ही जा
५३ सुन्दरकाण्ड धमकते हैं। 'लो, अब लो; पहले तो किसीने हमारी शिक्षा नहीं मानी'—इस प्रकार जिसे रोकते हैं, वही सतरा (चिढ़) जाता है। एक करें धौंज, एक कहैं, काढ़ौ सौंज, एक औंजि, पानी पीकै कहैं, बनत न आवनो। एक परे गाढ़े, एक डाढ़त हीं काढ़े, एक देखत हैं ठाढ़े, कहैं, पावकु भयावनो॥ 'तुलसी' कहत एक 'नीकें हाथ लाए कपि, अजहूँ न छाड़ै बालु गालको बजावनो'। 'धाओ रे, बुझाओ रे', 'कि बावरे हौ रावरे, या औरै आगि लागी, न बुझावै सिंधु सावनो' ॥१८॥ कोई दौड़ लगाते हैं, कोई कहते हैं 'असबाब निकालो', कोई ऊमससे घबड़ाकर पानी पीकर कहते हैं कि आते नहीं बनता, कोई बड़े संकटमें पड़ गये हैं, कोई जलते ही निकाले जाते हैं, कोई खड़े-खड़े देखते हैं और कहते हैं कि 'अग्नि बड़ी भयङ्कर है।' तुलसीदासजी कहते हैं, कोई कहते हैं कि 'हनुमान्जीने खूब हाथ लगाया, किन्तु यह मूर्ख अब भी गाल बजाना नहीं छोड़ता।' कोई कहता है—'अरे दौड़ो, अरे बुझाओ।' दूसरा कहता है—'क्या तुम बावले हुए हो ? यह कुछ और ही तरहकी आग लगी है, जिसे समुद्र और सावनका मेघ भी नहीं बुझा सकते।' कोपि दसकंध तब प्रलयपयोद बोले, रावन-रजाइ धाइ आए जूथ जोरि कै।
कवितावली ५४ कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ वेगि वानरु बहाइ मारौ महावारि बोरि कै॥ ‘भलें नाथ ! नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ, वरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै। जीवनतें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी, ‘तुलसी’ भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै ॥१९॥ तब रावणने क्रोधित होकर प्रलयकालके मेघोंको बुलाया और वे रावणकी आज्ञासे सब अपना दल बटोरकर दौड़े आये। उनसे लङ्कापतिने कहा—‘अरे मेघो ! जलती हुई लङ्कापुरीको शीघ्र बुझाओ और बंदरको बहाकर गम्भीर जलमें डुबाकर मार डालो।’ तब मेघोंके स्वामी ‘महाराज ! बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर प्रणाम करके चल दिये और बार-बार गरज-गरजकर मूसलधार पानी बरसाने लगे। किन्तु जलसे अग्नि और भी प्रज्वलित हो गयी और चपलता- पूर्वक चौगुनी बढ़ गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—तब सब मेघ घबड़ाकर मुँह मोड़कर भागे। इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात, सूखे सकुचात सब, कहत पुकार हैं। ‘जुग-षट भानु देखे, प्रलयकृसानु देखे, सेष-मुख-अनल विलोके बार-बार हैं॥ ‘तुलसी’ सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान, अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है’। वारिद-बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह, कहैं ‘दससीस ! ईस-वामता-विकार हैं' ॥२०॥
५५ सुन्दरकाण्ड बादल इधर तो अग्निकी लपटोंसे जले जाते हैं और उधर उनके शरीर ग्लानिसे गले जाते हैं। सब मेघ शुष्क हो सकुचाकर पुकारने लगे—'हमलोगोंने बारहों सूर्य देखे, प्रलयका अग्नि देखा और कई बार शेषजीके मुखकी ज्वाला देखी। परन्तु कभी जलको घृतके समान हुआ नहीं सुना। यह महान् आश्चर्य केसरीनन्दन (हनुमान्जी) ने कर दिखलाया।' मेघोंके वचन सुनकर मन्त्रीगण सिर धुनने लगे और रावणसे बोले—'यह सब ईश्वरकी प्रतिकूलताका विकार है।' 'पावकु, पवनु, पानी, भानु, हिमवानु, जमु, कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं। साहेबु महेसु, सदा संकित रमेसु मोहिं, महातप साहस विरंचि लीन्हें मोल हैं॥ 'तुलसी' तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु, बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं। को है ईस नामको, जो वाम होत मोहूसे को, मालवान ! रावरे के बावरे-से बोल हैं' ॥२१॥ तब रावणने कहा—'अग्नि, वायु, जल, सूर्य, हिमाचल, यम, काल और लोकपाल (इन्द्रादि) मेरे डरसे डाँवाडोल रहते हैं अर्थात् काँपते रहते हैं। हमारे स्वामी श्रीमहादेवजी हैं, लक्ष्मीपति विष्णु भी हमसे सदा शङ्कित रहते हैं। मैंने साहसपूर्वक महान् तपस्या करके ब्रह्माजीको भी मोल ले लिया है अर्थात् वे भी मेरे प्रतिकूल नहीं जा सकते। तीनों लोकोंमें आज कोई दूसरा राजा विराजमान नहीं है। और तो क्या, बाजे-बाजे राजाओंके बेटा-बेटीतक हमारे
यहाँ ओल्में ( गिरवीं ) हैं। माल्यवान् ! तुम्हारे वचन पागलोंके-से हैं। यह 'ईश्वर' नामका व्यक्ति कौन है जो मेरे-जैसे शूरवीरके प्रतिकूल जा सकता है ? भूमि भूमिपाल, ब्यालपालक पताल, नाक- पाल, लोकपाल जेते, सुभट-समाजु है। कहै मालवान, जातुधानपति ! रावरे को मनहूँ अकाजु आनै, ऐसो कौन आजु है ॥ रामकोहु पावकु, समीरु सीय-सासु, कीसु ईस-बामता विलोकु, बानरको ब्याजु है। जारत पचारि फेरि-फेरि सो निसंक लंक, जहाँ बाँको बीरु तोसो सूर-सिरताजु है ॥२२॥ तब माल्यवान् कहने लगा—'पृथ्वीमें जितने राजा हैं, पातालमें जितने सर्पराज हैं, जितने स्वर्गके अधिपति और लोकपाल हैं और जितना वीरोंका समाज है, हे राक्षसेश्वर ! उनमेंसे आज ऐसा कौन है जो मनसे भी आपका अपकार करनेकी सोचे ? किन्तु यह अग्नि तो श्रीरामचन्द्रजीका क्रोध है और वायु जानकीजीका श्वास है। और देखो, वानरके रूपमें यह ईश्वरकी प्रतिकूलता ही है, वानरका तो बहानामात्र है। इसीसे जहाँ तुम्हारे समान शूरशिरोमणि बाँका वीर मौजूद है, वहीं यह बार-बार बलपूर्वक किसी प्रकारकी शङ्का न करता हुआ लङ्काको जला रहा है।' पान-पकवान बिधि नाना के, सँधानो, सीधो, बिबिध-बिधान धान बरत बरवारहीं।
५७ सुन्दरकाण्ड कनककिरीट कोटि, पलँग, पेटारे, पीठ काढ़त कहार सब जरे भरे भारहीं ॥ प्रबल अनल बाढ़ें जहाँ काढ़े तहाँ डाढ़े, झपट-लपट भरे भवन-भँडारहीं । 'तुलसी' अगारु न पगारु न बजारु बच्यो, हाथी हथसार जरे, घोरे घोरसारहीं ॥२३॥ अनेक प्रकारके पेय पदार्थ, पकान्न, अचार, सीधा (चावल- दाल आदि) और अनेक प्रकारके धान बखारोंमें ही जल रहे हैं । करोड़ों सोनेके मुकुट, पलंग, पिटारे और सिंहासन निकालनेमें कहार- लोग भार लिये हुए ही जल रहे हैं। प्रबल अग्निके बढ़ जानेसे जो वस्तुएँ जहाँ निकालकर रखीं वहीं जल गयीं तथा अग्निकी झपट और लपट घर और भण्डारमें भर गयीं । गोसाईंजी कहते हैं कि न तो घर बचा, न दीवार या बाजार ही बचा । हाथी हाथीखानेमें और घोड़े घुड़सालहीमें जल गये । हाट-बाट हाटकु पिघिलि चलो घी-सो घनो, कनक-कराही लंक तलफति तायसों । नाना पकवान जातुधान बलवान सब पागि-पागि ढेरी कीन्ही भलीभाँति भायसों ॥ पाहुने कृसानु पवमानसौं परोसो, हनु- मान सनमानि कै जेंवाए चित-चायसों । 'तुलसी' निहारि अरिनारि दै-दै गारि कहैं, 'बावरें सुरारि बैरु कीन्हौ रामरायसों' ॥२४॥
कवितावली ५८ बाज़ार तथा राहमें ढेर-का-ढेर सोना घीके समान पिघलकर बहने लगा। अग्निके तापसे सोनेकी लङ्कारूपी कराही खदक रही है, उसमें बलवान् राक्षसरूपी अनेक प्रकारकी मिठाइयोंको बड़े प्रेमसे पागकर खूब ढेर लगा दिया है और अपने अग्निरूपी पाहुनेको वायु- द्वारा परसवाकर हनुमान्जीने बड़े चावसे आदरपूर्वक भोजन कराया है। यह देखकर शत्रु की स्त्रियाँ गाली दे-देकर कहती हैं—'अरे ! पागल रावणने श्रीरामचन्द्रके साथ वैर किया है !' रावनु सो राजरोगु बाढ़त बिराट-उर, दिनु-दिनु बिकल, सकल सुख राँक सो । नाना उपचार करि हारे सुर, सिद्ध, मुनि, होत न बिसोक, औत पावै न मनाक सो ॥ रामकी रजाइतें रसाइनी समीरसनु उतरि पयोधि पार सोधि सरवाक सो । जातुधान-बुट पुटपाक लंक-जातरूप- रतन जतन जारि कियो है मृगांक-सो ॥२५॥ विराट् पुरुषके हृदयमें रावणरूपी राजरोग बढ़ रहा था, जिससे व्याकुल होकर वह दिनोंदिन समस्त सुखोंसे हीन होता जाता था। देवता, सिद्ध और मुनिगण अनेक प्रकारकी ओषधि करके हार गये; परन्तु न तो वह शोकरहित होता था, न कुछ भी चैन पाता था। तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे रसवैद्य हनुमान्जीने समुद्रके पार उतरकर और ( लङ्कारूपी ) शिकारेको ठीक करके राक्षसरूपी बूटियोंके रसमें लङ्काके सोने और रत्नोंको यत्नपूर्वक फूँककर मृगाङ्क ( एक प्रकारका रसौषधि-विशेष ) बना डाला।
५९ सुन्दरकाण्ड सीताजीसे बिदाई जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम, नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै । मातु ! कृपा कीजै, सहिदानि दीजै, सुनि सीय दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै ॥ कहा कहौं तात ! देखे जात ज्यों बिहात दिन, बड़ी अवलंब ही, सो चले तुम्ह तोरि कै । 'तुलसी' सनीर नैन, नेहसों सिथिल वैन, बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै ॥२६॥ फिर श्रीहनुमान्जीने लङ्काको जला और उसे धूमरहित कर अपनी पूँछको समुद्रमें बुता (श्रीजानकीजीके) चरणोंमें शिर नवाया और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये; (तथा कहने लगे—) 'हे मातः ! कृपाकर कोई सहिदानी (चिह्न) दीजिये।' यह सुनकर श्रीजानकीजीने आशीर्वाद दिया और अपना सुन्दर चूडामणि उतारकर उसे देते हुए कहा—'भैया ! मैं तुमसे क्या कहूँ ? हमारे दिन किस प्रकार कट रहे हैं, सो तो तुम देखे ही जाते हो। तुम्हारे रहनेसे बड़ा सहारा था, उसे भी तुम तोड़कर चल दिये।' गोसाईंजी कहते हैं—जानकीजीके नेत्रोंमें जल भर आया और वाणी शिथिल हो गयी। (इस प्रकार सीताजीको) व्याकुल देख हनुमान्जी उन्हें विनयपूर्वक समझाते हुए कहने लगे। 'दिवस छ-सात जात जानिबे न, मातु ! धरु धीर, अरि-अंतकी अवधि रहि थोरिकै ।
३. अरण्यकाण्ड (पंचवटी व शूर्पणखा प्रसंग)
कवितावली ६० वारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु सानुज कुसल कपिकटकु वटोरि कै॥ बचन विनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि, 'तुलसी' त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै। 'जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी' कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै ॥२७॥ 'मातः ! धैर्य धारण करो। आपको छः-सात दिन बीतते कुछ मालूम न होंगे। अब शत्रुके नाशकी अवधि थोड़ी ही रह गयी है। भाईके सहित सूर्यकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्रजी) वानरसेना एकत्रित कर, समुद्रमें पुल बाँध यहाँ ( शीघ्र ही) सकुशल पधारेंगे।' इस प्रकार नम्र वचन कह, जानकीजीको समझाकर हनुमान्जी त्रिकूट पर्वतपर चढ़ गये और बड़े जोरसे चिल्लाकर बोले— 'रावणरूप गजराजके लिये मृगराजतुल्य जानकीवल्लभ (भगवान् श्रीराम) की जय हो।' (ऐसा कहकर) कपिराज (श्री- हनुमान्जी) वायुके आघातसे समुद्रमें हिलोरें उत्पन्न करते हुए (समुद्रके उस पार) कूद गये। साहसी समीरसनु नीरनिधि लंघि, लखि लंक सिद्धपीठु निसि जागो है मसानु सो। 'तुलसी' बिलोकि महासाहसु प्रसंन भई देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो॥ बाटिका उजारि, अच्छधारि मारि, जारि गढ़, भानुकुलभानुको प्रतापभानु-भानु-सो।
६१ सुन्दरकाण्ड करत बिसोक लोक-कोकनद, कोक कपि, कहै जामवंतु, आयो, आयो हनुमानु सो ॥२८॥ साहसी वायुनन्दनने समुद्रको लाँघ और लङ्कारूपी सिद्धपीठको जान उसमें रातभर मसान-सा जगाया है । उनके इस महान् साहसको देख श्रीजानकीजी-जैसी देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें वरदान दिया । उस समय जाम्बवान् कहने लगे—‘वाटिकाको उजाड़, अक्षयकुमारकी सेनाका संहार कर और फिर लङ्काको जलाकर भानुकुलभानु श्रीरामचन्द्रके प्रतापरूप सूर्यकी किरणके समान लोकरूपी कमल और वानररूपी चक्रवाकोंको शोकरहित करते हनुमान्जी आ गये, आ गये ।' गगन निहारि, किलकारी भारी सुनि, हनु- मान पहिचानि भये सानँद सचेत हैं । बूडत जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं ॥ ‘जै जै जानकीस, जै जै लखन-कपीस’ कहि, कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत-रेत हैं । अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा बालधी फिरावैं, मुख नाना गति लेत हैं ॥२९॥ · किलकारीके उच्च शब्दको सुनकर (सब वानर और भालू ) आकाशकी ओर देखने लगे और हनुमान्जीको पहचानकर आनन्दित और सचेत हो गये । मानो जहाजके साथ पथिकोंका समाज डूबता-डूबता बच गया । वे सब आज अपना नया जन्म
कवितावली ६२ जान एक दूसरेसे गले लगकर मिलने लगे। 'जय जानकीश, जय जानकीश, जय लक्ष्मणजी, जय सुग्रीव' ऐसा कहते हुए वे कौतुकी वानर कूदते हैं और समुद्रकी रेतीपर नाचते हैं। बलशाली अङ्गद, मयन्द, नील, नल—ये सब अपनी विशाल पूँछोंको घुमाते हैं और अनेक प्रकारसे मुँह बनाते हैं। आयो हनुमानु प्रानहेतु, अंकमाल देत, लेत पगधूरि एक, चूमत लँगूल हैं। एक बूझें बार-बार सीय-समाचार, कहें पवनकुमारु, भो विगत-श्रम-सूल हैं॥ एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल, एक पूजैं बाहु बलमूल तोरि फूल हैं। एक कहैं 'तुलसी' सकल सिधि ताकें, जाकें कृपा-पाथनाथ सीतानाथु सानुकूल हैं॥३०॥ अपने प्राणोंकी रक्षा करनेवाले हनुमान्जीको आया देख कोई उनसे गले लगकर मिलते हैं, कोई चरणधूलि लेते हैं, कोई पूँछ चूमते हैं, कोई बार-बार जानकीजीके समाचार पूछते हैं। जिन्हें कहनेहीसे हनुमान्जीकी सारी थकावट और व्यथा जाती रही। कोई हनुमान्जीको भूखे जान उनके आगे कन्द-मूल-फल लाकर रख देते हैं। कोई फूल तोड़कर हनुमान्जीकी बलशालिनी भुजाओंका पूजन करते हैं। कोई कहते हैं कि कृपासिन्धु सीतानाथ जिसके ऊपर अनुकूल हैं उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। सीयको सनेहु, सीलु, कथा तथा लंकाकी कहत चले चायसों, सिरानो पथु छनमें।