भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

कवितावली ४६ हनुमान्जी धधकते हुए अग्निसमूहसे सुशोभित हुए और बादलकी भाँति गरजे । इससे बड़े धीर-वीर योद्धा भाग गये और रावण भी व्याकुल हो उठा और बोला, 'दौड़ो, दौड़ो, इसे पकड़ लो।' यह सुनकर राक्षसोंकी सेना दौड़ी, मानो सावनका बादल जल बरसा रहा हो। वे योध्यालोग आगकी लपटोंकी झपटसे झुलसकर और वायुके झकोरोंसे घबड़ाकर व्याकुल हो गये । इस प्रकार उस समय वहाँ भारी भगदड़ पड़ गयी । रावणको भी मन्त्रीलोग धक्कोंसे ढकेलकर और ज़बरदस्ती ठेलकर ले चले और कहने लगे-हे नाथ ! आग भयंकर है, इसमें बल नहीं चलेगा । बड़ो बिकराल बेषु देखि, सुनि सिंघनादु, उठ्यो मेघनादु, सविषाद कहै रावनो । बेग जित्यो मारुतु, प्रताप मारतंड कोटि, कालऊ करालताँ, बड़ाईं जित्यो बावनो ॥ 'तुलसी' सयाने जातुधान पछिताने कहैं, जाको ऐसो दूत, सो तो साहेबु अबै आवनो । काहेको कुसल रोषें राम बामदेवहू की, बिषम बलीसों बादि बैरको बढ़ावनो ॥ ९ ॥ हनुमान्जीका बड़ा भयंकर वेष देख और उनका सिंहनाद सुन मेघनाद उठा और रावण भी चिन्तायुक्त होकर बोला- इसने तो वेगमें वायुको, प्रतापमें करोड़ों सूर्योंको, करालतामें कालको और बड़ाई (विशालता) में भगवान् वामनको भी जीत लिया । तुलसीदासजी कहते हैं—उस समय जो समझदार राक्षस थे, वे पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे, 'जिसका दूत ऐसा (प्रचण्ड) है, वह स्वामी तो