भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 48

४५ सुन्दरकाण्ड लिएँ सूल-सेल, पास-परिघ, प्रचंड दंड, भाजन सनीर, धीर धरें धनु-बान हैं॥ 'तुलसी' समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि, जातुधान पुंगीफल जव तिल धान हैं। सुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि, स्वाहा महा हाँकि हाँकि हुनैं हनुमान हैं॥७॥ उस (धधकते हुए) अग्निसमूहको देख और लोगोंका हाहाकार सुन रावणने कहा 'अरे ! इसे पकड़ो ! इसे पकड़ो !!' यह सुनकर बहुत-से बलवान् योद्धा त्रिशूल, बर्छी, फाँसी, परिघ, मजबूत डंडे और पानी भरे हुए बरतन लिये दौड़े और कुछ धीर लोगोंने धनुष- बाण भी धारण कर रक्खे थे। श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि लंकाको यज्ञकुण्ड समझो और वहाँकी सामग्री लकड़ी हैं तथा राक्षसगण सुपारी, जौ, तिल और धान हैं। हनुमान्जीकी पूँछ सुवा है, बलवान् शत्रु हवि हैं और उच्च हाँकरूपी स्वाहामन्त्रद्वारा हनुमान्जी हवन कर रहे हैं। गाज्यो कपि गाज ज्यों, बिराज्यो ज्वालजालजुत, भाजे बीर धीर, अकुलाइ उठ्यो रावनो। धावौ, धावौ, धरौ, सुनि धाए जातुधान धारि, बारिधारा उलदै जलदु जौन सावनो॥ लपट-झपट झहराने, हहराने बात, भहराने भट, पर्यो प्रबल परावनो। ढकनि ढकेलि, पेलि सचिव चले लै ठेलि, नाथ ! न चलैगो बलु, अनलु भयावनो॥८॥