भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

कवितावली ५४ मानो तलवार निकाल ली है। गोसाईंजी कहते हैं कि यह इन्द्रधनुष है अथवा बिजलीका समूह है या सुमेरु पर्वतसे अग्निकी भारी नदी बह चली है। उसे देखकर राक्षस और राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं—यह वनको तो उजाड़ चुका, अब नगरको और जलावेगा।

जहाँ-तहाँ बुबुक विलोकि बुबुकारी देत, जरत निकेतु धावौ, धावौ, लागी आगि रे। कहाँ तातु, मातु, भ्रात-भगिनी, भामिनी-भाभी, ढोटा छोटे छोहरा अभागे भौंडे भागि रे ॥ हाथी छोरौ, घोरा छोरौ, महिष-वृषभ छोरौ, छेरी छोरौ, सोवै सो, जगावौ, जागि, जागि रे। 'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं, बार-बार कह्यौं, पिय ! कपिसों न लागि रे ॥ ६ ॥

जहाँ-तहाँ आगकी भभकको देखकर पुकार देते हैं—'अरे ! भागो, भागो। आग लग गयी है, घर जल रहा है। अरे अभागे ! माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री-भौजाइ, लड़के-बच्चे, कहाँ हैं ? अरे गँवार ! भाग, भाग। हाथी खोलो, घोड़ा खोलो, भैंस और बैल खोलो तथा बकरियोंको भी खोल दो। वह सोता है, उसे जगा दो। अरे जागो ! जागो !!' गोसाईंजी कहते हैं कि इस दशाको देखकर राक्षसस्त्रियाँ व्याकुल होकर अपने-अपने पतियोंसे कहती हैं—'हे प्रियतम ! हमने बार-बार कहा था कि इस बंदरके मुँह मत लगो।

देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि, कह्यो, धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं।