कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१ सुन्दरकाण्ड हय हिहिनात, भागे जात गहरात गज, भारी भीर ठेलि-पेलि रौंदि-खौंदि डारहीं। नाम लै चिलात, बिललात अकुलात अति, 'तात तात ! तौंसिअत, झौंसिअत, झारहीं' ॥१५॥ आग लग गयी, आग लग गयी, ऐसा पुकारते हुए सब लोग जहाँ-तहाँ भाग चले। न माँ लड़कीको सँभालती है और न पिता पुत्रको सँभालता है। केश और वस्त्र खुल गये हैं, सब लोग नंगे हो गये हैं, और धुएँकी धुंधसे अंधे होकर लड़के-बूढ़े सब बार-बार 'पानी-पानी' पुकार रहे हैं। घोड़े हिनहिनाते हुए भागे जाते हैं, हाथी चिग्घार मारते हैं और जो बड़ी भारी भीड़ लगी हुई थी, उसे धक्कोंसे ढकेलकर पैरोंसे कुचले डालते हैं। सब लोग नाम ले-लेकर पुकार रहे हैं, और अत्यन्त बिलबिलाते तथा अकुलाते हुए कहते हैं, 'बाप रे बाप ! आगकी लपटोंसे तो झुलसे जाते हैं, तपे जाते हैं।' लपट कराल ज्वालजालमाल दहूँ दिसि, धूम अकुलाने, पहिचानै कौन काहि रे। पानीको ललात, बिललात, जरे गात जात, परे पाइमाल जात 'भात ! तूँ निवाहि रे ॥ प्रिया ! तूँ पराहि, नाथ ! नाथ ! तूँ पराहि, बाप ! बाप ! तूँ पराहि, पूत ! पूत ! तूँ पराहि रे' । 'तुलसी' बिलोकि लोग ब्याकुल बेहाल कहैं, लेहि दससीस ! अब बीस चख चाहि रे ॥१६॥