कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ५२ दसों दिशाओंमें ज्वालमालाओंकी भयंकर लपटें फैल गयी हैं । सब लोग धुएँसे व्याकुल हो रहे हैं । उस धूममें कौन किसे पहचान सकता था । लोग पानीके लिये लालायित होकर बिलबिला रहे हैं, शरीर जला जाता है, सब लोग तबाह हुए जाते हैं और कहते हैं—'भैया ! बचाओ ! प्रिये ! तुम भागो । हे नाथ ! हे नाथ ! भागो । पिताजी ! पिताजी ! दौड़ो । अरे बेटा ! ओ बेटा ! भाग ।' तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग व्याकुल और परेशान होकर कह रहे हैं—'अरे दशशीश रावण ! अब बीसों आँखोंसे अपनी करतूत देख ले ।' बीथिका-बज़ार प्रति, अटनि अगार प्रति, पवरि-पगार प्रति बानरु बिलोकिए । अध-ऊर्ध बानर, बिदिसि-दिसि बानरु है, मानो रह्यो है भरि बानरु तिलोकिएँ ॥ मूँदें आँखि हियमें, उघारें आँखि आगें ठाढ़ो, धाइ जाइ जहाँ-तहाँ, और कोऊ कोकिए । लेहु, अब लेहु, तब कोउ न सिखावो मानो, सोई सतराइ जाइ, जाहि-जाहि रोकिए ॥१७॥ [ हनुमान्जी ऐसी शीघ्रतासे घूम रहे हैं कि ] गली-गली, बाजार-बाजार, अटारी-अटारी, घर-घर, द्वार-द्वार, दीवार-दीवारपर वानर ही दिखायी पड़ रहा है । ऊपर-नीचे और दिशा-विदिशाओंमें वानर ही दीखता है, मानो वह वानर तीनों लोकोंमें भर गया है । आँख मूँदनेसे हृदयमें और आँख खोलनेसे आगे खड़ा दिखायी देता है । जहाँ और किसीको पुकारते हैं, वहाँ मानो हनुमान्जी ही जा