कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३ सुन्दरकाण्ड धमकते हैं। 'लो, अब लो; पहले तो किसीने हमारी शिक्षा नहीं मानी'—इस प्रकार जिसे रोकते हैं, वही सतरा (चिढ़) जाता है। एक करें धौंज, एक कहैं, काढ़ौ सौंज, एक औंजि, पानी पीकै कहैं, बनत न आवनो। एक परे गाढ़े, एक डाढ़त हीं काढ़े, एक देखत हैं ठाढ़े, कहैं, पावकु भयावनो॥ 'तुलसी' कहत एक 'नीकें हाथ लाए कपि, अजहूँ न छाड़ै बालु गालको बजावनो'। 'धाओ रे, बुझाओ रे', 'कि बावरे हौ रावरे, या औरै आगि लागी, न बुझावै सिंधु सावनो' ॥१८॥ कोई दौड़ लगाते हैं, कोई कहते हैं 'असबाब निकालो', कोई ऊमससे घबड़ाकर पानी पीकर कहते हैं कि आते नहीं बनता, कोई बड़े संकटमें पड़ गये हैं, कोई जलते ही निकाले जाते हैं, कोई खड़े-खड़े देखते हैं और कहते हैं कि 'अग्नि बड़ी भयङ्कर है।' तुलसीदासजी कहते हैं, कोई कहते हैं कि 'हनुमान्जीने खूब हाथ लगाया, किन्तु यह मूर्ख अब भी गाल बजाना नहीं छोड़ता।' कोई कहता है—'अरे दौड़ो, अरे बुझाओ।' दूसरा कहता है—'क्या तुम बावले हुए हो ? यह कुछ और ही तरहकी आग लगी है, जिसे समुद्र और सावनका मेघ भी नहीं बुझा सकते।' कोपि दसकंध तब प्रलयपयोद बोले, रावन-रजाइ धाइ आए जूथ जोरि कै।