भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

कवितावली ५४ कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ वेगि वानरु बहाइ मारौ महावारि बोरि कै॥ ‘भलें नाथ ! नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ, वरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै। जीवनतें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी, ‘तुलसी’ भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै ॥१९॥ तब रावणने क्रोधित होकर प्रलयकालके मेघोंको बुलाया और वे रावणकी आज्ञासे सब अपना दल बटोरकर दौड़े आये। उनसे लङ्कापतिने कहा—‘अरे मेघो ! जलती हुई लङ्कापुरीको शीघ्र बुझाओ और बंदरको बहाकर गम्भीर जलमें डुबाकर मार डालो।’ तब मेघोंके स्वामी ‘महाराज ! बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर प्रणाम करके चल दिये और बार-बार गरज-गरजकर मूसलधार पानी बरसाने लगे। किन्तु जलसे अग्नि और भी प्रज्वलित हो गयी और चपलता- पूर्वक चौगुनी बढ़ गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—तब सब मेघ घबड़ाकर मुँह मोड़कर भागे। इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात, सूखे सकुचात सब, कहत पुकार हैं। ‘जुग-षट भानु देखे, प्रलयकृसानु देखे, सेष-मुख-अनल विलोके बार-बार हैं॥ ‘तुलसी’ सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान, अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है’। वारिद-बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह, कहैं ‘दससीस ! ईस-वामता-विकार हैं' ॥२०॥