भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 58

५५ सुन्दरकाण्ड बादल इधर तो अग्निकी लपटोंसे जले जाते हैं और उधर उनके शरीर ग्लानिसे गले जाते हैं। सब मेघ शुष्क हो सकुचाकर पुकारने लगे—'हमलोगोंने बारहों सूर्य देखे, प्रलयका अग्नि देखा और कई बार शेषजीके मुखकी ज्वाला देखी। परन्तु कभी जलको घृतके समान हुआ नहीं सुना। यह महान् आश्चर्य केसरीनन्दन (हनुमान्जी) ने कर दिखलाया।' मेघोंके वचन सुनकर मन्त्रीगण सिर धुनने लगे और रावणसे बोले—'यह सब ईश्वरकी प्रतिकूलताका विकार है।' 'पावकु, पवनु, पानी, भानु, हिमवानु, जमु, कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं। साहेबु महेसु, सदा संकित रमेसु मोहिं, महातप साहस विरंचि लीन्हें मोल हैं॥ 'तुलसी' तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु, बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं। को है ईस नामको, जो वाम होत मोहूसे को, मालवान ! रावरे के बावरे-से बोल हैं' ॥२१॥ तब रावणने कहा—'अग्नि, वायु, जल, सूर्य, हिमाचल, यम, काल और लोकपाल (इन्द्रादि) मेरे डरसे डाँवाडोल रहते हैं अर्थात् काँपते रहते हैं। हमारे स्वामी श्रीमहादेवजी हैं, लक्ष्मीपति विष्णु भी हमसे सदा शङ्कित रहते हैं। मैंने साहसपूर्वक महान् तपस्या करके ब्रह्माजीको भी मोल ले लिया है अर्थात् वे भी मेरे प्रतिकूल नहीं जा सकते। तीनों लोकोंमें आज कोई दूसरा राजा विराजमान नहीं है। और तो क्या, बाजे-बाजे राजाओंके बेटा-बेटीतक हमारे