भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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कवितावली ५० सालवृक्षके समान बड़ी-बड़ी भुजाएँ बढ़ा रक्खी हैं ? अरे मूर्खों ! इसी बलसे रघुनाथजीसे वैर बढ़ाया है ?' हाट-बाट, कोट-ओट, अटनि, अगार, पौरि, खोरि-खोरि दौरि-दौरि दीन्ही अति आगि है। आरत पुकारत, सँभारत न कोऊ काहू, ब्याकुल जहाँ सो तहाँ लोक चले भागि हैं॥ बालधी फिरावै, बार-बार झहरावै, झरैं बुँदिया-सी, लंक पघिलाइ पाग पागि है। 'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं, चित्रहू के कपि सों निसाचरु न लागिहै ॥१४॥ (इस प्रकार हनुमान्‌जीने ) हाट-बाट, किले-प्राकार, अटारी, घर-दरवाजे और गली-गलीमें दौड़-दौड़कर भारी आग लगा दी। सब लोग आर्तनाद कर रहे हैं, कोई किसीको नहीं सँभालता। सब लोग व्याकुल होकर जहाँ-तहाँ भाग चले। हनुमान्‌जी पूँछको घुमाकर बार-बार झाड़ते हैं, उससे बुँदियाकी भाँति चिनगारियाँ झड़ रही हैं, मानो लङ्काको पिघलाकर उसकी चासनीमें उस बुँदियाको पागेंगे। यह देखकर राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं कि अब राक्षसलोग चित्रके वानरसे भी नहीं भिड़ेंगे। लगी, लागी आगि, भागि-भागि चले जहाँ-तहाँ, धीयको न माय, बाप पूत न सँभारहीं। छूटे बार, बसन उघारे, धूम-धुंद अंध, कहैं बारे-बूढ़े 'बारि, बारि' बार बारहीं ॥