भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

४९ सुन्दरकाण्ड रानियाँ सब जलती हुई घबड़ाकर दौड़ी चली जाती हैं। वे केशरीनन्दन (हनूमान्‌जी) के (विकराल) वेषको देख नहीं सकतीं। रावणकी स्त्रियाँ हाथ मल-मलकर रह जाती हैं और सिर धुन-धुनकर कहती हैं कि तिलभर वस्तु भी घरके बाहर नहीं हो सकी। सब असबाब जल गया, न मैंने ही निकाला और न तूने ही निकाला। सबको अपने-अपने जीकी पड़ी थी, घर-आँगन कौन सँभालता। मेघनादको देखकर मन्दोदरी दुःखपूर्वक क्रोधित होती है और कहती है कि इसी दाढ़ीजारका बोया हुआ सब काट रहे हैं [यदि यह इस बंदरको पकड़कर न लाता तो ऐसी आफत क्यों आती?] रावनकी रानीं बिलखानी कहैं जातुधानीं, हाहा! कोऊ कहै बीसबाहु दसमाथ सों। काहे मेघनाद! काहे, काहे रे महोदर! तूँ, धीरजु न देत, लाइ लेत क्यों न हाथसों॥ काहे अतिकाय! काहे, काहे रे अकंपन! अभागे तीय त्यागे भोंड़े भागे जात साथसों। 'तुलसी' बढ़ाई वादि सालतें बिसाल बाहें, याहीं बल बालिसो बिरोधु रघुनाथसों॥१३॥ राक्षसियाँ जो रावणकी रानियाँ थीं, बिलख-बिलखकर कहती हैं—'हाय! हाय!! कोई यह हाल बीस भुजा और दस सिरवाले रावणको सुनावे। क्यों रे मेघनाद! क्यों रे महोदर! तुम हमें धैर्य क्यों नहीं बँधाते और अपने हाथोंमें आश्रय क्यों नहीं देते? क्यों रे अतिकाय! क्यों रे अकम्पन! अरे अभागे गँवारो! क्यों स्त्रियोंको त्यागकर साथसे भागे जाते हो? तुमलोगोंने व्यर्थ ही क० ४---

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस) · पृष्ठ 52, कुल 228 में से · BharatKosha