भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

कवितावली ४८ निपट निडर देखि काहूँ न लख्यो बिसेषि, दीन्हो ना छुड़ाइ कहि कुलके कुठारसों ॥ छोटे औ बड़ेरे मेरे पूतऊ अनेरे सब, साँपनि सों खेलैं, मेलैं गरे छुराधार सों । 'तुलसी' मँदोवै रोइ-रोइ कै बिगोवै आपु, बार-बार कह्यो मैं पुकारि दाढ़ीजारसों ॥११॥ 'वनको उजाड़ा, तो उजाड़ा, उससे कुछ बिगाड़ नहीं हुआ था; किन्तु ये बेचारे इस बन्दरको उपवनसे हठात् बाँधकर ले आये । उसे बिल्कुल निडर देखकर भी किसीने कुछ विशेष नहीं समझा और न कुलकुठार मेघनादसे कहकर किसीने उसे छुड़ाया ही । मेरे छोटे बड़े सभी पुत्र अन्यायी हैं, ये साँपोंसे खेलवाड़ करते हैं और छूरेकी धारमें अपनी गर्दनें रखते हैं।' गोसाईंजी कहते हैं कि मन्दोदरी रो-रोकर अपनेको क्षीण करती है और कहती है कि मैंने इस दाढ़ीजार (मेघनाद) से बार-बार पुकारकर कहा (परन्तु इसने मेरी एक बात न सुनी) । रानीं अकुलानी सब डाढ़त परानी जाहिं, सकें न बिलोकि बेषु केसरीकुमारको । मीजि-मीजि हाथ, धुनैं माथ दसमाथ-तिय, 'तुलसी' तिलौ न भयो बाहेर अगारको ॥ सबु असबाबु डाढ़ो, मैं न काढ़ो, तैं न काढ़ो, जियकी परी, सँभारै सहन-भँडार को । खीझति मँदोवै सबिषाद देखि मेघनादु, बयो लूनिअत 'सब याही दाढ़ीजारको ॥१२॥