कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७ सुन्दरकाण्ड कनककिरीट कोटि, पलँग, पेटारे, पीठ काढ़त कहार सब जरे भरे भारहीं ॥ प्रबल अनल बाढ़ें जहाँ काढ़े तहाँ डाढ़े, झपट-लपट भरे भवन-भँडारहीं । 'तुलसी' अगारु न पगारु न बजारु बच्यो, हाथी हथसार जरे, घोरे घोरसारहीं ॥२३॥ अनेक प्रकारके पेय पदार्थ, पकान्न, अचार, सीधा (चावल- दाल आदि) और अनेक प्रकारके धान बखारोंमें ही जल रहे हैं । करोड़ों सोनेके मुकुट, पलंग, पिटारे और सिंहासन निकालनेमें कहार- लोग भार लिये हुए ही जल रहे हैं। प्रबल अग्निके बढ़ जानेसे जो वस्तुएँ जहाँ निकालकर रखीं वहीं जल गयीं तथा अग्निकी झपट और लपट घर और भण्डारमें भर गयीं । गोसाईंजी कहते हैं कि न तो घर बचा, न दीवार या बाजार ही बचा । हाथी हाथीखानेमें और घोड़े घुड़सालहीमें जल गये । हाट-बाट हाटकु पिघिलि चलो घी-सो घनो, कनक-कराही लंक तलफति तायसों । नाना पकवान जातुधान बलवान सब पागि-पागि ढेरी कीन्ही भलीभाँति भायसों ॥ पाहुने कृसानु पवमानसौं परोसो, हनु- मान सनमानि कै जेंवाए चित-चायसों । 'तुलसी' निहारि अरिनारि दै-दै गारि कहैं, 'बावरें सुरारि बैरु कीन्हौ रामरायसों' ॥२४॥