कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ५८ बाज़ार तथा राहमें ढेर-का-ढेर सोना घीके समान पिघलकर बहने लगा। अग्निके तापसे सोनेकी लङ्कारूपी कराही खदक रही है, उसमें बलवान् राक्षसरूपी अनेक प्रकारकी मिठाइयोंको बड़े प्रेमसे पागकर खूब ढेर लगा दिया है और अपने अग्निरूपी पाहुनेको वायु- द्वारा परसवाकर हनुमान्जीने बड़े चावसे आदरपूर्वक भोजन कराया है। यह देखकर शत्रु की स्त्रियाँ गाली दे-देकर कहती हैं—'अरे ! पागल रावणने श्रीरामचन्द्रके साथ वैर किया है !' रावनु सो राजरोगु बाढ़त बिराट-उर, दिनु-दिनु बिकल, सकल सुख राँक सो । नाना उपचार करि हारे सुर, सिद्ध, मुनि, होत न बिसोक, औत पावै न मनाक सो ॥ रामकी रजाइतें रसाइनी समीरसनु उतरि पयोधि पार सोधि सरवाक सो । जातुधान-बुट पुटपाक लंक-जातरूप- रतन जतन जारि कियो है मृगांक-सो ॥२५॥ विराट् पुरुषके हृदयमें रावणरूपी राजरोग बढ़ रहा था, जिससे व्याकुल होकर वह दिनोंदिन समस्त सुखोंसे हीन होता जाता था। देवता, सिद्ध और मुनिगण अनेक प्रकारकी ओषधि करके हार गये; परन्तु न तो वह शोकरहित होता था, न कुछ भी चैन पाता था। तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे रसवैद्य हनुमान्जीने समुद्रके पार उतरकर और ( लङ्कारूपी ) शिकारेको ठीक करके राक्षसरूपी बूटियोंके रसमें लङ्काके सोने और रत्नोंको यत्नपूर्वक फूँककर मृगाङ्क ( एक प्रकारका रसौषधि-विशेष ) बना डाला।