भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

कवितावली ६२ जान एक दूसरेसे गले लगकर मिलने लगे। 'जय जानकीश, जय जानकीश, जय लक्ष्मणजी, जय सुग्रीव' ऐसा कहते हुए वे कौतुकी वानर कूदते हैं और समुद्रकी रेतीपर नाचते हैं। बलशाली अङ्गद, मयन्द, नील, नल—ये सब अपनी विशाल पूँछोंको घुमाते हैं और अनेक प्रकारसे मुँह बनाते हैं। आयो हनुमानु प्रानहेतु, अंकमाल देत, लेत पगधूरि एक, चूमत लँगूल हैं। एक बूझें बार-बार सीय-समाचार, कहें पवनकुमारु, भो विगत-श्रम-सूल हैं॥ एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल, एक पूजैं बाहु बलमूल तोरि फूल हैं। एक कहैं 'तुलसी' सकल सिधि ताकें, जाकें कृपा-पाथनाथ सीतानाथु सानुकूल हैं॥३०॥ अपने प्राणोंकी रक्षा करनेवाले हनुमान्‌जीको आया देख कोई उनसे गले लगकर मिलते हैं, कोई चरणधूलि लेते हैं, कोई पूँछ चूमते हैं, कोई बार-बार जानकीजीके समाचार पूछते हैं। जिन्हें कहनेहीसे हनुमान्‌जीकी सारी थकावट और व्यथा जाती रही। कोई हनुमान्‌जीको भूखे जान उनके आगे कन्द-मूल-फल लाकर रख देते हैं। कोई फूल तोड़कर हनुमान्‌जीकी बलशालिनी भुजाओंका पूजन करते हैं। कोई कहते हैं कि कृपासिन्धु सीतानाथ जिसके ऊपर अनुकूल हैं उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। सीयको सनेहु, सीलु, कथा तथा लंकाकी कहत चले चायसों, सिरानो पथु छनमें।