कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१ सुन्दरकाण्ड करत बिसोक लोक-कोकनद, कोक कपि, कहै जामवंतु, आयो, आयो हनुमानु सो ॥२८॥ साहसी वायुनन्दनने समुद्रको लाँघ और लङ्कारूपी सिद्धपीठको जान उसमें रातभर मसान-सा जगाया है । उनके इस महान् साहसको देख श्रीजानकीजी-जैसी देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें वरदान दिया । उस समय जाम्बवान् कहने लगे—‘वाटिकाको उजाड़, अक्षयकुमारकी सेनाका संहार कर और फिर लङ्काको जलाकर भानुकुलभानु श्रीरामचन्द्रके प्रतापरूप सूर्यकी किरणके समान लोकरूपी कमल और वानररूपी चक्रवाकोंको शोकरहित करते हनुमान्जी आ गये, आ गये ।' गगन निहारि, किलकारी भारी सुनि, हनु- मान पहिचानि भये सानँद सचेत हैं । बूडत जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं ॥ ‘जै जै जानकीस, जै जै लखन-कपीस’ कहि, कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत-रेत हैं । अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा बालधी फिरावैं, मुख नाना गति लेत हैं ॥२९॥ · किलकारीके उच्च शब्दको सुनकर (सब वानर और भालू ) आकाशकी ओर देखने लगे और हनुमान्जीको पहचानकर आनन्दित और सचेत हो गये । मानो जहाजके साथ पथिकोंका समाज डूबता-डूबता बच गया । वे सब आज अपना नया जन्म