कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ६० वारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु सानुज कुसल कपिकटकु वटोरि कै॥ बचन विनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि, 'तुलसी' त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै। 'जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी' कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै ॥२७॥ 'मातः ! धैर्य धारण करो। आपको छः-सात दिन बीतते कुछ मालूम न होंगे। अब शत्रुके नाशकी अवधि थोड़ी ही रह गयी है। भाईके सहित सूर्यकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्रजी) वानरसेना एकत्रित कर, समुद्रमें पुल बाँध यहाँ ( शीघ्र ही) सकुशल पधारेंगे।' इस प्रकार नम्र वचन कह, जानकीजीको समझाकर हनुमान्जी त्रिकूट पर्वतपर चढ़ गये और बड़े जोरसे चिल्लाकर बोले— 'रावणरूप गजराजके लिये मृगराजतुल्य जानकीवल्लभ (भगवान् श्रीराम) की जय हो।' (ऐसा कहकर) कपिराज (श्री- हनुमान्जी) वायुके आघातसे समुद्रमें हिलोरें उत्पन्न करते हुए (समुद्रके उस पार) कूद गये। साहसी समीरसनु नीरनिधि लंघि, लखि लंक सिद्धपीठु निसि जागो है मसानु सो। 'तुलसी' बिलोकि महासाहसु प्रसंन भई देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो॥ बाटिका उजारि, अच्छधारि मारि, जारि गढ़, भानुकुलभानुको प्रतापभानु-भानु-सो।