भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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६३ सुन्दरकाण्ड

कह्यो जुवराज बोलि बानरसमाजु, आजु खाहु फल, सुनि पेलि पैठे मधुबनमें ॥ मारे बागवान, ते पुकारत देवान गे, 'उजारे बाग अंगद', देखाए घाय तनमें । कहै कपिराजु, करि काजु आये कीस, तुल- सीसकी सपथ, महामोदु मेरे मनमें ॥३१॥

फिर वे सब श्रीजानकीजीके प्रेम और शीलकी तथा लङ्काकी कथा बड़े चावसे कहते हुए चले, (जिससे) क्षणमात्रमें रास्ता समाप्त हो गया । [किष्किन्धा में पहुँचनेपर] युवराज (अङ्गद) ने कपिसमाजको बुलाकर कहा, 'आज सब लोग फल खाओ।' यह सुनकर वे सब-के-सब बलपूर्वक मधुवनमें घुस गये । उन्होंने जिन बागवानोंको मारा, वे पुकारते हुए दरबारमें गये और शरीरमें घाव दिखाकर कहने लगे कि युवराज अङ्गदने बागोंको उजाड़ दिया और [हमलोगोंको मारा], तब सुग्रीवने कहा - तुलसीके स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी) की शपथ है, आज मेरे मनमें बड़ा आनन्द है; मालूम होता है, वानरगण कार्य कर आये हैं ।

भगवान् रामकी उदारता

नगरु कुबेरको सुमेरुकी बराबरी, विरंचि-बुद्धिको विलासु लंक निरमान भो । ईसहि चढ़ाइ सीस बीसबाहू बीर तहाँ, रावनु सो राजा रज-तेजको निधानु भो ॥