भारतकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

कवितावली [L1b] ६४ 'तुलसी' तिलोककी समृद्धि, सौंज, संपदा सकेलि चाकि राखी रासि, जाँगरु जहानु भो। तीसरे उपास बनवास सिंधु पास सो समाजु महाराजजू को एक दिन दानु भो ॥३२॥

कुबेरकी पुरी लङ्का (स्वर्णमय होनेके कारण) सुमेरुके समान है। वह मानो ब्रह्माकी बुद्धिका कौशल ही बनकर खड़ा हो गया है। वहाँ राजसी तेजकी खान, बीस भुजाओंवाला रावण श्रीमहादेव- जीको अपने मस्तक चढ़ाकर राजा हुआ। तुलसीदासजी कहते हैं—मानो तीनों लोकोंकी विभूति, सामग्री और सम्पत्तिकी राशिको एकत्रित कर यहीं चाँक लगाकर (सीमा बाँधकर) रख दी है तथा इसीका भूसा आदि सारा संसार बन गया। यही सारी सम्पत्ति वनवासी महाराज रामजीको समुद्रतटपर तीन दिन उपवास करनेके बाद [ विभीषणको देते समय ] एक दिनका दान हो गयी।

इति सुन्दरकाण्ड