कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलंकाकाण्ड राक्षसोंकी चिन्ता बड़े बिकराल भालु-बानर बिसाल बड़े, 'तुलसी' बड़े पहार लै पयोधि तोपिहैं। प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड खंडि मंडि मेदिनीको मंडलीक-लीक लोपिहैं ॥ लंकदाहु देखें न उछाहू रह्यो काहुन को, कहैं सब सचिव पुकारि पाँव रोपि हैं। 'बाँचिहै न पाछैं त्रिपुरारिहू मुरारिहू के, को है रन रारिको जौं कोसलेसु कोपिहैं ॥ १ ॥ लंकाका दाह देखकर किसीका उत्साह नहीं रहा। पीछे सब मन्त्रिगण प्रणपूर्वक पुकार-पुकारकर कहने लगे—'महाभयानक भालू और बड़े विशालकाय वानर बड़े-बड़े पहाड़ लाकर समुद्रको तोप (पाट) देंगे। वे अत्यन्त प्रबल, पराक्रमी और दुर्द्दण्ड वीरोंके भुजदण्डोंका खण्डन कर, और उनसे पृथ्वीको समलंकृत कर त्रिभुवनविजयी (रावण) की मर्यादाका लोप कर देंगे।' शिवजी और विष्णु भगवान्के बचानेपर भी कोई नहीं बचेगा। यदि श्रीरामचन्द्रजीने क्रोध किया तो उनसे युद्ध करनेवाला भला कौन है ? क० ५-