कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ६६ त्रिजटाका आश्वासन त्रिजटा कहत बार-बार तुलसीखरीसों, 'राधौ बान एकहीं समुद्र सातौ सोषिहैं। सकुल सँघारि जातुधान-धारि, जम्बुकादि, जोगिनी-जमाति कालिकाकलाप तोषिहैं ॥ राजु दै नेवाजिहैं बजाइ कै बिभीषनै, बजैंगे ब्योम बाजने विबुध प्रेम पोषिहैं। कौन दसकंधु, कौन मेघनादु बापुरो, को कुंभकर्नु कीटु, जब रामु रन रोषिहैं' ॥ २ ॥ त्रिजटा राक्षसी तुलसीदासकी स्वामिनी श्रीजानकीजीसे बार-बार कहती है कि श्रीरामचन्द्रजी एक ही बाणसे सातों समुद्रोंको सोख लेंगे। वे राक्षससेनाका कुलसहित संहार कर गीदड़ों, योगिनियों और कालिकाओंके समूहोंको तृप्त करेंगे। वे डंकेकी चोट विभीषणको राज्य देकर उसपर अनुग्रह करेंगे। उस समय आकाशमें बाजे बजने लगेंगे और देवतालोग प्रेमसे पुष्ट हो जायँगे । जब युद्धक्षेत्रमें श्रीरघुनाथजी कुपित होंगे तब भला रावण क्या चीज़ है, बेचारा मेघनाद भी किस गिनतीमें है और कीटतुल्य कुम्भकर्ण भी क्या है। बिनय-सनेह सों कहति सिय त्रिजटासों, पाए कछु समाचार आरजसुवनके । पाए जू, बँधायो सेतु, उतरे भानुकुलकेतु, आए देखि-देखि दूत दारुन दुवनके॥