कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७ लंकाकाण्ड वदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो मिटे घटे तमीचर-तिमिर भुवनके । लोकपति-कोक-सोक मूँदे कपि-कोकनद, दंड द्वै रहे हैं रघु-आदित-उवनके ॥ ३ ॥ श्रीजानकीजी विनय और प्रेमपूर्वक त्रिजटासे कहती हैं कि 'क्या आर्यपुत्रके कोई समाचार मिले ?' त्रिजटा बोली—'हाँ जी, पाये हैं; भानुकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्र ) समुद्रपर पुल बाँधकर इस पार उतर आये । घोर राक्षस ( रावण ) के दूत यह सब देख-देखकर आये हैं । उन लोगोंके मुख मलिन हो गये हैं और वे बलहीन तथा दीन हो गये हैं । मानो चौदहों भुवनका राक्षसरूपी अन्धकार मिटना और घटना चाहता है । इन्द्रादि लोकपालरूप चक्रवाकोंकी शोक- निवृत्ति और वानरसेनारूप मुँदे हुए कमलोंकी प्रफुल्लताके लिये श्रीरामरूप सूर्यके उदित होनेमें केवल दो ही दण्ड ( घड़ी ) काल रह गया है । झूलना सुभुजु मारीचु खरु त्रिसिरु दूषनु बालि, दलत जेहि दूसरो सरु न साँध्यो । आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों सकत संग्रामु दसकंधु काँध्यो ॥ समुझि तुलसीस-कपि-कर्म घर-घर घैरु, बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो ।